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माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्मः- मुनि श्री प्रमाणसागर कोडरमा विधानसभा क्षेत्र की विधायिका डा.नीरा यादव ने लिया आशीर्वाद”

धर्म

माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्मः- मुनि श्री प्रमाणसागर

कोडरमा विधानसभा क्षेत्र की विधायिका डा.नीरा यादव ने लिया आशीर्वाद”

 गिरीडीहः  

“माता-पिता की सेवा को धर्म में इसलिए महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि इस सृष्टि में हमें लाने का श्रेय उन्हीं को है” उपरोक्त उदगार राष्ट्रीय संत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने व्यक्त किये।

 

गुणायतन मध्यभारत केराष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया मुनि श्री संघ सहित मधुवन के गुणायतन में विराजमान है।प्रतिदिन मुनि श्री की वाणी को देश एवं विदेश से आन लाईन लाखों लोग सुनते है,तथा अपनी शंकाओं का समाधान करते है एवं प्रतिदिन सेंकड़ो की संख्या में मुनि श्री के दर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त करने गुरु भक्त एवं जन सेवक आते रहते है,इसी श्रंखला में मुनि श्री के दर्शन एवं आशीर्वाद लैने कोडरमा विधानसभा क्षेत्र की विधायिका डा.नीरा यादव पधारी एवं उन्होंने आशीर्वाद प्राप्त किया। मुनि श्री ने “व्हील टू हील” भावनायोग जीवन का एक विज्ञान पुस्तक आशीर्वाद स्वरुप प्रदान की।

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उन्होंने कहा कि “भावनायोग” को समग्रता से समझें तो यह केवल शरीर को स्वस्थ रखने की कोई साधारण प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन को भीतर से रूपांतरित करने की साधना है। कोई कह सकता है कि भावनायोग तन को स्वस्थ, मन को मस्त और चेतना को पवित्र बनाने का एक श्रेष्ठ साधन है।भावनायोग का संबंध मात्र किसी बाह्य क्रिया या औपचारिक अभ्यास से नहीं है। यह केवल सहायक चिकित्सा पद्धति भी नहीं, बल्कि हमारी भावनाओं को निर्मल, सकारात्मक और पवित्र बनाने का मार्गदर्शन है। जब मनुष्य की भावनाएँ शुद्ध होती हैं, तब उसका तन स्वतः स्वस्थ रहने लगता है, मन प्रसन्न और शांत हो जाता है तथा चेतना प्रकाशमान बन जाती है।मनुष्य के अधिकांश दुख, तनाव, अशांति और विकार उसकी दूषित भावनाओं से उत्पन्न होते हैं। ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, भय और नकारात्मकता भीतर की ऊर्जा को क्षीण कर देते हैं, जबकि प्रेम, करुणा, मैत्री और कृतज्ञता जैसी भावनाएँ जीवन में नवचेतना का संचार करती हैं। भावनायोग हमें इन्हीं श्रेष्ठ भावों को जागृत करने की प्रेरणा देता है।यदि मनुष्य स्वयं को भावनात्मक रूप से संतुलित और निर्मल बना ले, तो जीवन की अनेक समस्याएँ स्वतः सुलझने लगती हैं। तन की स्वस्थता, मन की प्रसन्नता और आत्मा की पवित्रता एक स्वाभाविक उपलब्धि बन जाती है। भावनायोग का सबसे बड़ा लाभ यही है कि यह मनुष्य को भीतर से बदलता है और उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को उज्ज्वल बना देता है।

 

 

मुनि श्री ने माता पिता के ऋण के संद्रभ में कहा कि हमारी संस्कृति में कृतज्ञता को सबसे श्रेष्ठ गुण माना गया है और कृतघ्नता को सबसे बड़ी नीचता की श्रेणी में रखा गया है,जो मनुष्य अपने उपकारियों के प्रति कृतज्ञ नहीं होता,उसका कभी उद्धार नहीं हो सकता।जब कृतज्ञता की बात आती है, तो सबसे पहली कृतज्ञता उन माता-पिता के प्रति होनी चाहिए जिनके माध्यम से हमें यह मानव जीवन प्राप्त हुआ। यदि वे न होते तो हमारा जन्म ही कैसे होता? और केवल जन्म देना ही पर्याप्त नहीं था—उन्होंने हमारा पालन-पोषण किया, हमें संस्कार दिए, जीवन जीने की दिशा दी। यदि उन्होंने हमारा उचित लालन-पालन न किया होता,तो आज हमारा जीवन कैसा होता,इसकी कल्पना भी कठिन है।हमारा सम्पूर्ण जीवन माता-पिता की कृपा से पल्लवित और पुष्ट हुआ है।हमारे शरीर का एक-एक कण उनके त्याग और प्रेम का प्रतीक है। इसलिए उनके प्रति श्रद्धा, संवेदना और कृतज्ञता का भाव होना स्वाभाविक है।यही कृतज्ञता हमें उनकी सेवा के लिए प्रेरित करती है।वास्तव में हम माता-पिता की सेवा नहीं करते, बल्कि उनके ऋण को चुकाने का प्रयास करते हैं। और ऋण वही चुकाता है जिसके हृदय में उपकारों का स्मरण होता है। इसलिए उनके प्रति हमारी दृष्टि सदैव आदर और समर्पण की होनी चाहिए।

 

 

हमारी संस्कृति में ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव’ की महान उक्ति दी गई है। गणेशजी की कथा इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। जब कार्तिकेय समस्त तीर्थों की यात्रा पर निकले, तब गणेशजी ने अपने माता-पिता की परिक्रमा कर यह सिद्ध कर दिया कि माता-पिता की सेवा और वंदना ही समस्त तीर्थों के पुण्य के समान है।

 

 

शास्त्रों की ये शिक्षाएँ हमें कृतज्ञता, सेवा और संस्कार का पाठ पढ़ाती हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने माता-पिता के प्रति श्रद्धा, सेवा और समर्पण का भाव अवश्य रखना चाहिए, क्योंकि उनके चरणों में ही जीवन का सच्चा धर्म और सबसे बड़ा पुण्य निहित है। मुनि श्री ने कहा कि “प्रामाणिक पाठशाला अपना कार्य अत्यंत मनोवैज्ञानिक एवं प्रभावी ढंग से कर रही है। वह बच्चों के कोमल हृदय में संस्कारों की अलख जगा रही है। यदि तकनीक का सही उपयोग किया जाए तो वह जीवन में गुणात्मक परिवर्तन का सशक्त माध्यम बन सकती है।खेल-खेल में जीवन की मूल बातों और नैतिक मूल्यों को बच्चों के हृदय में उतार देना प्रमाणिक पाठशाला की सबसे बड़ी विशेषता है। इसलिये सभी बच्चों को ओन लाईन प्रमाणिक पाठशाला से जुड़ना चाहिये।

           संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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