त्रिमूर्ति मंदिर में सल्लेखना पूर्वक हुई विश्वसिद्ध सागर जी महाराज की समाधि डोल यात्रा के साथ देह पंचतत्व में विलीन
सुसनेर।
शुक्रवार को अध्यात्म और वैराग्य की एक और लौ शांत हो गई। परम पूज्य गणधर मुनि श्री 108 विवर्द्धन सागर जी महाराज के संघस्थ क्षुल्लक श्री 105 विश्वसिद्ध सागर जी महाराज ने शुक्रवार की सुबह श्री दिगम्बर जैन त्रिमूर्ति मन्दिर परिसर में समाधि मरण को प्राप्त किया।
दोपहर 1 बजे इंदौर-कोटा राष्ट्रीय राजमार्ग स्थित त्रिमूर्ति मंदिर से महाराज जी की अंतिम डोल यात्रा निकाली गई। जो नगर के प्रमुख मार्गो से होते हुए पुनः त्रिमूर्ति मन्दिर पहुँची। बैंड-बाजों के साथ निकली इस यात्रा में बड़ी संख्या में समाजजन शामिल हुए, जिनकी आंखों में अपने गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और विदाई का गम साफ झलक रहा था। डोल यात्रा ने पूरे नगर का भ्रमण किया, जहां भक्तों ने जगह-जगह गुरुदेव को नमन किया। नगर भ्रमण के पश्चात त्रिमूर्ति मंदिर परिसर में ही मुनि श्री की अंतिम संस्कार की क्रियाएं विधि-विधान के साथ संपन्न कराई गईं। और उनकी देह पंचतत्व में विलीन हो गई।

मुनिश्री 108 विश्वनायक सागर महाराज के द्वारा मंत्रोच्चार के साथ लाभार्थी कोमल चंद जैन छत्रीवाला, प्रदीप कुमार लुहाडिया एवं ओमप्रकाश जैन गुरुकृपा परिवार ने मुनि श्री की पार्थिव देह का विधिवत पूजन अभिषेक कर मुखाग्नि दी। 

मुनि श्री विवर्धन सागर महाराज ने महाराज श्री के जीवन कृतित्व का वर्णन किया
गणधर मुनिश्री 108विवर्धन सागर जी महाराज ने सबको सम्बोधित करते हुए समाधिस्थ सन्त के साधना जीवन का वर्णन किया। मुनि श्री ने बताया कि समाधिस्थ संत ने रोजमर्रा की तरह अपनी चर्या में साधनारत थे। सुबह अचानक उनका स्वास्थ खराब हुआ तो उनकी भावना के अनुरूप उनको मुनि दीक्षा प्रदान की गई जिसके बाद उन्होंने अपनी देह को त्याग दिया। समाधिस्थ सन्त की अंतिम यात्रा में नगर सहित आसपास क्षेत्रो के जैन समाजजन शामिल हुए।




संचालन त्रिमूर्ति मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष अशोक जैन मामा व उपाध्यक्ष दिलीप पांडे ने किया।
त्रिमूर्ति मन्दिर ट्रस्ट के मीडिया प्रभारी दीपक जैन पत्रकार से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
