*“lचौथे काल की अनुभूति: एक संस्मरण”* _देखने मिला चौथे काल का नज़ारा_ एक भावपूर्ण संस्मरण) आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज
वन की निस्तब्धता… चारों ओर घनघोर हरियाली…
कहीं पक्षियों की मधुर ध्वनि, तो कहीं पत्तों की सरसराहट—ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रकृति स्वयं किसी दिव्य आगमन की प्रतीक्षा में मौन खड़ी हो।


और इसी अलौकिक वातावरण में, तारंगा जी से उदयपुर की ओर विहाररत आचार्य भगवन् श्री आर्जवसागर जी महामुनिराज ससंघ* की आहारचर्या का वह अद्भुत दृश्य देखने को मिला, जिसने मानो समय को ही पीछे लौटा दिया—चौथे काल का साक्षात् नज़ारा! प्रस्तुत हो रहा हो
संघ के चरण जब उस निर्जन वन क्षेत्र में पहुँचे, तब न कहीं नगर की चहल-पहल थी, न सुविधाओं की कोई व्यवस्था—केवल साधना, संयम और आत्मबल की उज्ज्वल छवि थी। तपस्वी मुनिराजों की शांत मुद्रा, निर्विकार चाल और अंतरमुखी दृष्टि, उस वातावरण को और भी पवित्र बना रही थी।
आहारचर्या का क्षण
आहारचर्या का वह क्षण अत्यंत विरल था। कोई बाह्य आडंबर नहीं, कोई विशेष आयोजन नहीं—केवल मर्यादा, नियम और शुद्ध भाव। श्रावक भी अत्यंत विनम्रता और श्रद्धा के साथ उपस्थित थे। उस घने जंगल में, जहां सामान्य जन का पहुँचना भी कठिन हो, वहाँ ऐसी दिव्य आहारचर्या का संपन्न होना सचमुच विस्मयकारी था।
संघस्थ ब्रह्मचारी ऋषिका दीदी बताती है की ऐसा लग रहा था मानो हम इतिहास के किसी पवित्र पृष्ठ को प्रत्यक्ष देख रहे हों—वह काल, जब मुनि निर्जन वन में विहार करते थे, अल्प में संतोष रखते थे और केवल आत्मकल्याण की साधना में लीन रहते थे।
आचार्य श्री का तेजस्वी, किन्तु अत्यंत सरल व्यक्तित्व, उस पूरे दृश्य का केंद्र था। उनकी उपस्थिति से ही वह वनभूमि तपोभूमि में परिवर्तित हो गई थी। संघ के प्रत्येक मुनिराज उसी अनुशासन, उसी साधना और उसी उच्च आदर्श का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत कर रहे थे।
यह केवल एक आहारचर्या नहीं थी—यह संयम, तप और परम्परा का सजीव दर्शन था। जिसने भी इसे देखा, उसका मन भाव-विभोर हो उठा। ऐसा अनुभव बार-बार नहीं मिलता; यह तो पुण्य के उदय का परिणाम था।
अंततः, हृदय में यही भाव उमड़ता है—
हमने केवल एक दृश्य नहीं देखा, हमने धर्म की उस प्राचीन धारा को अनुभव किया, जो आज भी आचार्य श्री के सान्निध्य में उसी पवित्रता के साथ प्रवाहित हो रही है।
ऐसे दिव्य क्षणों को शत-शत नमन…*
साभार – संघस्थ व्रतीगण
