ज़िन्दगी में शान्ति तब आएगी..जब मन की भाग-दौड़ हमारे वश में होगी..! अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
परतापुर बांसवाड़ा राजस्थान
अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ससंघ परतापुर बांसवाड़ा के जैन मंदिर में विराजमान हैं आचार्य श्री ने उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि मन की दो प्रवृत्तियाँ हैं — एक शुभ प्रवृत्ति और दूसरी अशुभ प्रवृत्ति। शुभ प्रवृत्ति सद्गुणों से प्रेरित होकर जीवन को संवारती है, और अशुभ प्रवृत्ति दुर्गुणों को निमंत्रण देकर जीवन को तबाह करती है।
मनुष्य का मन बहुत बेईमान होता है। वह अशुभ कार्यों में उत्साह से भाग लेता है, जबकि शुभ कार्यों से दूर भागता है। मनुष्य का मन सोया हुआ है। उसे जगाने के लिए ही धर्म, मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और सत्संग का प्रावधान है। क्योंकि जीवन एक कर्मभूमि है, और उसके उचित-अनुचित फल सबको भोगने ही पड़ते हैं। इसलिए जो लोग जीवन को सहज, सरल और शिशुवत होकर जीते हैं, वे जीवन का आनन्द प्राप्त कर लेते हैं; और जो छल, कपट, माया और प्रपंच का जीवन जीते हैं, वे जीते-जी दुःखी रहते हैं तथा मृत्यु के बाद भी दुःख ही भोगते हैं।


परमात्मा के यहाँ देर है, अंधेर नहीं। इसलिए मनुष्य को 24 घंटों में कम-से-कम 30 मिनट धर्मग्रंथों का वाचन अवश्य करना चाहिए।
धर्मग्रंथों के वाचन से अज्ञान दूर होता है, दिशा-बोध मिलता है, जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान मिलता है तथा तनावग्रस्त जीवन को जीने की सही कला प्राप्त होती है। धर्मग्रंथ मनुष्य को सत्य का मार्ग चुनने की प्रेरणा देते हैं। उनमें केवल उपदेश ही नहीं होते, बल्कि सही निर्णय लेने का साहस भी मिलता है। वे जीवन के भय, भ्रम, अज्ञान और हीनता का निवारण कर अन्तःकरण की समस्याओं का स्थायी समाधान प्रदान करते हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि लोग धर्मग्रंथों का वाचन स्वयं को सुधारने के लिए नहीं, बल्कि दूसरों को सुधारने के लिए करते हैं। यही कारण है कि आज समाज और देश में बातों के बादशाह तो बहुत हैं, लेकिन आचरण के आचार्य देखने, सुनने और जानने को बहुत कम मिलते हैं।



_सौ बात की एक बात_ —
एकांत में हम स्वयं के साथ जैसा व्यवहार करते हैं, समझ लेना वही सच्चे धर्म और ग्रंथ-वाचन का वास्तविक फल है…!!!
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
