मनुष्य ही आतंक को बढ़ावा देते हैं मुनि श्री अजीत सागर महाराज
सागर
मुनि श्री 108 अजीत सागर महाराज ने भाग्योदय परिसर में मूकमाटी महाकाव्य के अध्ययन कराते हुए अपने उद्बोधन में कहा कि आतंकवादी मनुष्य है और मनुष्य के द्वारा ही आतंक को बढ़ावा दिया जाता है। आतंकवादी मनुष्य को ही मारते हैं। जब मनुष्य की मौत आ जाती है चाहे वह आतंकवादी क्यों ना हो, बकरे के अंदर भी क्यों ना हो, वहां पर भी मारा जाता है। उसे को उसका कर्म मारता है। दुर्गति का कारण हर व्यक्ति का हर प्राणी को स्वयं का कर्म होता है। उन्होंने इस बात की सीख दी की मन में हमेशा अनुकंपा का भाव ही रखना चाहिए।
अनुकंपा के विषय में मुनि श्री ने विशेष रूप से बताया कि कभी भी अनुकंपा में स्वार्थ नहीं हुआ करता है। और कभी भी अनुकंपा दिखाने का नहीं होना चाहिए। आज के वातावरण में मनुष्य मनुष्य से ही पीड़ित है। अनुकंपा दया की बातचीत शब्दों तक ही सीमित रह गई है। अपने वाला ही अपने को काट रहा है। आज के जमाने में किसी को भी पैसा देना गुनाह हो गया है। मनुष्य पैसा लेते समय गाय जैसा हो जाता है और मांगने पर शेर बन जाता है।
महाराज श्री ने कहा भगवान महावीर का सिद्धांत जियो और जीने दो मनुष्य के आचरण में दिखाई नहीं दे रहा है। एक उदाहरण के माध्यम से कहा कि शेर अपनी जाति को छोड़कर दूसरों पर प्रहार करता है। लेकिन आज का मनुष्य जानवर से भी गया बीता हो गया है। स्वार्थ के कारण दया और अनुकंपा को छोड़कर अपने को मारने का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि असाता कर्म के समय आप आकुल व्याकुल होते हैं। यह सब तीव्र कर्म के कारण होता है। उन्होंने कहा कि असाता में धैर्य क्षमतावान अपने आप को रखो। प्रतिकूलता में व्यक्ति में विशुद्धता होने की जरूरत है। अनुकूलता में विशुद्धि बढ़ाई तो कोई फायदा नहीं। नाविक तो वही सही होता है जो विपरीत धारा में भी तत्पर रहकर अपने गंतव्य तक पहुंच जाता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
