जहाँ पग पग में जैनत्व वहां दिगंबर प्रतिमा पर बौद्ध मान्यता,, कैसे स्वयं फैसला करे
बहुत कम लोगों को पता है कि छत्तीसगढ़ का जगदलपुर (बस्तर) एवम इससे लगे ओडिशा क्षेत्र का समृद्ध प्राचीन जैन इतिहास रहा है।आज भी इस क्षेत्र से भूगर्भ से जैन तीर्थंकरों की अनेकानेक प्रतिमाएं प्राप्त हो रहीं हैं , जागरूकता की कमी के कारण अन्य मतावलंबी लोग जिन प्रतिमाओं पर क्लेम कर उन्हें अपने मत की सिद्ध करने में लगे हुए है,,एक बड़ा उदाहरण आप गूगल पर सर्च करे तो भोंगापाल की बड़ी सी जिन प्रतिमा है जिसे अब प्रशासन ने बौद्ध प्रतिमा के रूप मान्यता दे रखी है और,, बौद्ध सर्किट बना कर विदेशी दर्शनों को आने लगे है,,
इस हेतुजगदलपुर के श्री विनोद जैन (वंदना एजेंसी ) जो कि एक प्रज्ञवान जागरुक श्रावक रहे हैं उन्होंने अनेक वर्षों से भ्रमण यात्रायें आदि कर समाचार पत्रों के माध्यम से इस बाबत एक एल्बम तैयार किया है जिसे pdf में कन्वर्ट कर इस पोस्ट में संलग्न किया जा रहा है,, सधर्मी जनों से आशा है कि उक्त pdf अपने नगर के दिगंबर संतों तक अवश्य पहुंचाये प्रिंट करवा कर उन्हें पढ़ने हेतु दे,।

ऐसी ही एक जानकारी और है
शिक्षाविद व बस्तर के इतिहासकार डॉ. केके झा ने बताया कि इंद्रावती और नारंगी नदी के संगम स्थल के उपर गढ़बोदरा में छिंदक नागवंशी राजा सोमेश्वर देव ने भोगवतीपुर नगर बसाया था। यह नगर ध्वस्त हो चुका है लेकिन यहां के ध्वस्त दीवार में भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा अभी भी लगी हुई है।

मिली जानकारी अनुसार कुरूसपाल में जैनियों की अलग बस्ती ही थी। जैन तीर्थकर वक्रग्रीव, पुष्पदंत, साधु सहरंग, साधु सोमण, साधु सहदेव, साधु मईघर, साधु श्रीधर, साधुदेव और साधु ने चक्रतीर्थ (चित्रकोट) क्षेत्र में समय व्यतीत करते हुए कई ग्रंथों की रचना की थी। वर्ष 1065 में राजा मधुरांतक देव ने राजपुर गांव दान किया था।पुण्य कार्य के गवाह भी कई जैन साधु बने थे। यह बात प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होती है।

लोक मान्यता
भगवान पार्श्वनाथ जी की प्रतिमाओं के प्रति उपरोक्त गांवों के रहवासियों में बड़ी आस्था है। इनका मानना है कि इन मूर्तियों के कारण ही गांवों म खुशहाली व शांति है। गढ़बोदरा की मूर्ति के संदर्भ में तिरथा के कृपाराम सेठिया, नारायणपाल वे जगदेव ठाकुर, संतराम यादव, कुरूषपाल वे रत्तीराम, धनेश्वर और लोहंडीगुड़ा के सीताराम प्यारेलाल मेश्राम का कहना है कि वर्षों पहले कुछ चोर पार्श्वनाथ की प्रतिमा चुरा कर ले गए थे लेकिन कुछ दिनों बाद ही उक्त चार चोरो की अकस्मात मौत हो गई थी। परिजनों को जब वस्तुस्थिति की जानकारी मिली तो वे मूर्ति पुनः बोदरा में छोड़ गए हैं। मौत के भय से गलत मानसिकता के लोग मूर्ति के पास फटकते भी नहीं हैं।
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नोट ~ वर्तमान में आचार्य श्री विद्यासागर जी समयसागर जी के सुशिष्य मुनिश्री आगमसागर जी मुनिश्री पुनीतसागर जी ऐलक श्री धैर्यसागर जी एवं ऐलक श्री स्वागतसागर जी इस भूमि को अपनी चरणरज से पावन कर रहे हैं एवं ओडिशा के नवरंगपूर,भवानीपटना ,कोटपाढ़, केसिंगा, लड्डूगांव ,आदि स्थानों तक विचरण कर समाज को संस्कारीत,संगठित एवं जिनागार से सुसज्जित कर के भागीरथी पुरूषार्थ कर अनुगृहित कर रहे हैं।
संकलन ~ सम्यक प्रभावना जगदलपुर 8103651818 से प्राप्त जानकारी के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312


