Man speaks into a microphone on a decorated stage at a Hindu religious event, with a banner of portraits behind him and a blue backdrop of deities.

गुरुकृपा और सच्चे पश्चाताप से पतित जीव भी अपना उद्धार कर सकता हैः- मुनि श्री उद्यमसागर

धर्म

गुरुकृपा और सच्चे पश्चाताप से पतित जीव भी अपना उद्धार कर सकता हैः- मुनि श्री उद्यमसागर

विदिशा

“जिस प्रकार शरीर में चुभा हुआ कांटा जब तक बाहर न निकाल जाए,वह पीड़ा देता है, उसी प्रकार जिसको अपनी आत्मा का सच्चा वोध हो जाता है,उसे अपनी आत्मा में लगे पाप, अपराध और कषाय भीतर ही भीतर कचोटने लगते हैं,और जब तक मनुष्य उन पापों का पश्चाताप नहीं कर लेता वह पाप उसे कांटे के समान पीड़ा देते है, लेकिन जैसे ही वह योग्य गुरु के पास जाकर अपने पापों का प्रायश्चित्त करताहै, और गुरु उसे प्रायश्चित देकर उसके दोषों का शमन करते है, तो उसके अंतर्मन को वास्तविक शांति प्राप्त होती है”

 

 

उपरोक्त उदगार मुनि श्री उद्यमसागर महाराज ने श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर में प्रातःकालीन धर्मसभा में व्यक्त किये। उन्होंने एक पौराणिक कथा “अंजन चोर” का जीवन” सुनाते हुये कहा कि यह एक अद्भुत उदाहरण है, राजपुत्र बचपन के गलत संगति और संस्कारों में आकरअनेक पापों और दुर्व्यसनों में लिप्त होकर नामी “अंजनचोर” बन जाता है, कथा आगे बड़ती है,एक दिन अंजन चोर एक वैश्या के कहने से रानी का नौ लखा हार चुराकर भाग रहा था कि वह पहरेदारों की रेंज में आ जाता है,और वह हार को वंही छोड़ जंगल की ओर निकल जाता है,और वह क्या देखता है कि एक व्यक्ति रस्सी के झूले से बार बार ऊपर नीचे हो रहा है और उस झूले के नीचे नुकीले बाण लगे है यदि वह गिरा तो उसका अंत निश्चित है, जब चोर ने उससे पूंछा तो उसने अपना नाम जिनदत्त सेठ बताया और कहा कि में णमोकार महामंत्र के माध्यम से वहु विद्या सिद्ध कर रहा हुं,जिसमें इस रस्सी पर चड़कर ऊपर से यह रस्सी काटना है इस रस्सी के कटते ही वह बहु विद्या सिद्ध हो जायेगी लेकिन जैसे ही रस्सी काटने को होता हुं कि प्राणों का मोह हो जाता है,कंही विद्या सिद्ध नहीं हुई तो? और जैसे ही नीचे आता हुं कि फिर णमोकार महामंत्र के माध्यम से उस विद्या को सिद्ध करने का भाव जाग्रत हो जाता है इसलिये ऊपर नीचे बार बार हो रहा हूं, अंजन चोर जिसके पीछे महल के पहरेदार लगे थे उसने कुछ सोचा और खट से उस रस्सी के झूले पर चड़ गया लेकिन वह वंहा पहुंच णमोकार महामंत्र कोभूल गया और उसके मुख से निकला आणं ताणं कछु न जाणं सेठ बचन प्रमाणं” और उसने खट से रस्सी को काट दिया वह नीचे गिरता उसके पूर्व ही वह विद्या देवी प्रकट हो गई और उसको थाम लिया तथा उससे कहा स्वामी आप मांगिये जो आप चाहते है? तो अंजन चोर एक दम सकपकाया और उसे णमोकार महामंत्र पर पूर्ण श्रद्धा हो गई उसने मन ही मन चाहा कि वह अकृत्रिम जिन चैत्यालयों की बंदना करे तो तुरंत ही वह इच्छा पूर्ण हो गई और वह बंदना करता है, इससे उसके अंदर धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा होकर आत्मजागरण होता है, और वह गुरुदेव के चरणों में पहुँचकर विनम्र भाव से पहुंच अपने अपराधों का प्रायश्चित्त करता है,उस प्रायश्चित्त के प्रभाव से उसका अंतःकरण निर्मल हो जाता है। और वही अंजन चोर आगे चलकर गुरु से दीक्षा धारण कर “मुनि अंजन सागर” बन साधना और तपस्या में लीन हो जाते है,

 

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गुरु महाराज के मन में स्वाभाविक सावधानी थी कि कहीं यह नवदीक्षित मुनि पुनः पुराने संस्कारों और पापों की ओर आकर्षित न हो जाए, क्योंकि संसार के संस्कार बड़े प्रबल होते हैं। परंतु अंजन मुनि ने अपने वैराग्य, तप और ध्यान से ऐसा आत्मपराक्रम जागृत किया कि वे निरंतर आत्मध्यान में लीन रहने लगे।

परिणामस्वरूप, अल्प समय में ही उनको केवलज्ञान की प्राप्ती हो जाती है।

 यह प्रसंग हमें संदेश देता है कि व्यक्ति कितना भी पतित क्यों न हो, यदि उसके भीतर सच्चा पश्चाताप, गुरु के प्रति समर्पण और आत्मशुद्धि की तीव्र भावना जाग जाए, तो वही जीव महान आध्यात्मिक ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकता है। उपरोक्त जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने देते हुये बताया प्रतिदिन प्रातः8:30 बजे से मुनि श्री के प्रवचन चल रहे है।      संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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