•केशवरायपाटन में धर्मसभा में स्वस्ति भूषण माताजी ने दिए प्रवचन भारतीय संस्कृति को अपनाने पर जोर
केशवरायपाटन
अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा में स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति ने बच्चों और युवाओं का भविष्य प्रभावित किया है। आधुनिकता की की दौड़ में समाज अंधा होता जा रहा है।
उन्होंने कहा कि आज लोग अंग्रेजी शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं और हिंदी बोलने वालों को पिछड़ा समझते हैं, जबकि यह सोच समाज को अंधकार की ओर ले जा रही है। भारतीय संस्कृति में ही संस्कार और शिष्टाचार निहित हैं और समाज का भला उसी में लौटने से संभव है।
माताजी ने कहा कि ग्रंथों का स्वाध्याय अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि प्राचीन समय में ग्रंथ प्राकृत भाषा में लिखे जाते थे। णमोकार मंत्र भी प्राकृत भाषा में है। आचार्य कुंदकुंद स्वामी की ओर से रचित समयसार जैसे ग्रंथ भी प्राकृत भाषा में ही हैं, जबकि शिलालेख भी इसी भाषा में मिलते हैं। बाद में संस्कृत और फिर हिंदी का प्रचलन बढ़ा।




क्षमाशीलता सबसे बड़ा गुण है
माताजी ने कहा कि क्षमाशीलता मानव जीवन का सबसे बड़ा गुण है, जो व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है। जो व्यक्ति क्षमा करना सीख लेता है, वह क्रोध, द्वेष और ईर्ष्या जैसी नकारात्मक भावनाओं से मुक्त हो जाता है। क्षमा केवल दूसरों को माफ करना नहीं, बल्कि अपने मन को शांति देना भी है। जीवन में कई बार परिस्थितियां हमें आहत करती हैं, लेकिन क्षमा का भाव अपनाने से संबंध टूटने से बचते हैं और समाज में प्रेम व सद्भाव बढ़ता है। क्षमाशील व्यक्ति हमेशा सम्मान और शांति प्राप्त करता है। इसलिए हमें अपने जीवन में क्षमा को अपनाकर आगे बढ़ना चाहिए, यही सच्चा आध्यात्मिक मार्ग है।
भारत की संस्कृति ऋषि और मुनियों की परंपरा
उन्होंने कहा कि भारत में पहले प्राकृत, संस्कृत और हिंदी प्रमुख भाषाएं थीं, लेकिन मुगलों और अंग्रेजों के शासनकाल में क्रमशः उर्दू और अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा। माताजी ने कहा कि भारत की संस्कृति ऋषि-मुनियों की परंपरा पर आधारित है, जो पूजनीय है। उन्होंने कहा कि भारत पूर्व दिशा में स्थित है, जहां सूर्य सूर्य उदय होता है, जबकि पश्चिमी देश सूर्यास्त की ओर हैं और उनकी संस्कृति भी उसी दिशा में जाती हुई प्रतीत होती है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
