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आचार्य श्री आर्जवसागर महाराज सानिध्य में अक्षय तृतीया पर्व मनाते हुए भक्तामर विधान हुआ हमें अहिंसा का पालन करके देश को भी अहिंसामय बनाकर जीवन को सफल बनाना है आचार्य श्री

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आचार्य श्री आर्जवसागर महाराज सानिध्य में अक्षय तृतीया पर्व मनाते हुए भक्तामर विधान हुआ हमें अहिंसा का पालन करके देश को भी अहिंसामय बनाकर जीवन को सफल बनाना है आचार्य श्री 

मंगलवाड़ा राज.

परम पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री 108 आर्जव सागर महाराज सानिध्य में अक्षय तृतीया पर्व मनाया गया इसी क्रम में श्रीजी का अभिषेक एवम शांतिधारा की गई।

 

 

इस क्रम में आचार्य श्री 108 आर्जव सागर महाराज ने भगवान ऋषभदेव के बारे में बताया उन्होंने कहा कि प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान का जन्म तृतीय काल में इच्छावाकु वंश में अयोध्या नगरी में हुआ और उसी काल में मोक्ष को गये। वे राजा नाभिराय- मरुदेवी के पुत्र थे उन्होंने कहा कि भगवान के गर्भ में आने के छह माह पहले से ही जन्म होने तक प्रतिदिन देवों द्वारा चौदह करोड़ रत्नों की वर्षा प्रारंभ होती रही एवं चारों और भय रहित सुख शांति का वातावरण था। और आम जन 10 प्रकार के कल्पवृक्ष से ही भोग उपभोग की वस्तुएं प्राप्त कर लेते थे।Bright Indian ad showing a pot of gold coins, marigold garland, and a yellow circle with Hindi text promoting Navratri snack shop; trays of snacks visible.

 

 

 

 

भगवान आदिनाथ से ही कर्म भूमि का आरंभ हुआ इनके ज्ञान, कौशल ,प्रतिभा को देखकर लोगों को इनसे ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा जागृत हुई। कर्मभूमि का शुभारंभ हुआ अतः लोगों को षट कर्म की शिक्षा दी। लोगों को खेती करना सिखाया उन्होंने कहा कि”कृषि करो या ऋषी बनो” का संदेश भगवान आदिनाथ के काल से ही प्रारंभ हुआ,जिस तरह से उन्होंने जीना सिखाया। जब जब भी पंचकल्याणक प्रतिष्ठा होते है तो भगवान आदिनाथ को ही प्रतीक स्वरुप रखा जाता है। 83 लाख पूर्व वर्ष बीत जाने के बाद उन्होंने उपदेश दिया कि “हमारा लक्ष्य मात्र जीवन का भरण पोषण करना ही नहीं अपितु हमारा लक्ष्य तो जन्म मरण का अंत करना है” “मुक्ति को प्राप्त करना है” पुरुषार्थ करके अपने जीवन को सार्थक बनाना है। यह उपदेश हमें ऐसे दिगंबर ,वीतरागी, तपस्वी संत ही दे सकते हैं। 

 

       जीवन में गुरु अवश्य बनाना 

 

उन्होंने कहा कि अपने जीवन में गुरु अवश्य बनाना चाहिए क्योंकि “जिसके जीवन में गुरु नहीं ,उसका जीवन शुरू नहीं।” गुरु ही हमें जीवन में आगे बढ़ने का मोक्षमार्ग को प्रशस्त करने का उपदेश देते हैं। उन्होंने हमें बताया कि धर्म ,अर्थ,काम और मोक्ष पुरुषार्थ किस प्रकार करें? हमें आज जो यह धर्म मिला है। वह भगवान आदिनाथ से ही प्राप्त हुआ है;जिनका अंतिम लक्ष्य मात्र मोक्ष को प्राप्त करना था। आप के प्रथम पुत्र भरत के नाम से ही इस देश का नाम “भारत”पड़ा आपके पुत्र बाहुबली ने पोदनपुर में राज्य किया और उस राज्य का त्याग कर मुनि बनकर पदवी धारियों में प्रथम रूप से मोक्ष प्राप्त किया। कर्नाटक राज्य में गोम्मटेश बाहुबली की प्रतिमा विश्व के आश्चर्य में गिनी जाती है। बंधुओं हमारा भी यही लक्ष्य होना चाहिए। हमें यही भावना भानी चाहिए कि हे भगवान! हम भी आपके मार्ग पर चलें। आपके बताए हुए धर्म का पालन करें और आपके गुणों को प्राप्त कर आप जैसे बनें।

 

 

      अंत में आचार्य गुरुदेव ने कहा कि प्रत्येक धर्म में हिंसा और दया का मूल स्थान है। अतः हमें अहिंसा का पालन करके देश को भी आहिंसामय बनाकर जीवन को सफल बनाना है।

        अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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