Crowd gathered around a white marble seated statue adorned with yellow and red marigold garlands during a ceremony nearby.

अगर आप सन्तुष्ट हैं, तो सेठ सम्राट और सन्त से कम नहीं हैं.. अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

धर्म

अगर आप सन्तुष्ट हैं, तो सेठ सम्राट और सन्त से कम नहीं हैं.. अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
परतापुर बांसवाड़ा राजस्थान

अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज की अहिंसा संस्कार पदयात्रा दिक्षा भुमी परतापुर में मंगल प्रवेश कर चुकी है उसी श्रुंखला में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि मन की भूख आज तक बड़े-बड़े सम्राट भी पूरी नहीं कर पाये.. फिर हम-आप किस खेत की मूली हैं-?

 

 

भारी भरकम उदर तुम्हारा – जैसे हो गणेश का पेट, अथवा हाथी जैसा विशाल, या फिर कहो इण्डिया गेट से भी विस्तृत, पर उससे भी अधिक विशाल है मानव मन का पेट। तीनों लोक की दौलत हथियाने का अवसर खोजते हो, विश्व सम्राट बनने का झूठा सपना देखते हो। पर मन की महिमा अदभूत और निराली है – कितना भी मिल जाये, सदा खाली का खाली ही रहता है। इसलिए मन की बाल्टी पर सन्तोष की पेंदी लगाओ और सुख, शान्ति, आनंद तथा प्रेम से भरा जीवन जीते हुए मुस्कुराओ। अन्यथ: जीते-जी भी आपका मन कभी तृप्त होने वाला नहीं है।

आदमी दो की मांग आज तक पूरी नहीं कर पाया — स्त्री और मन। इनकी इच्छायें पूरी करते-करते कई ज़िन्दगियां बीत गई, पीते-पीते कई प्याले रीत गए, ना मन तृप्त हुआ और ना स्त्री संतुष्ट हो पाई। मन तृप्त होता भी कैसे-? क्योंकि तुम उसे भोगों से तृप्त करना चाहते हो, वासना से भरना चाहते हो, जबकि सच्चाई यह है कि — मन भोग से नहीं – योग से, विकार से नहीं – वैराग्य से, वासना से नहीं – प्रार्थना से तृप्त होता है। वासना तो खारे पानी के समान है। अब आप ही बताओ – खारे पानी से आज तक किसकी प्यास बुझी है-? खारा जल प्यास बुझाता नहीं बल्कि और बढ़ा देता है।

तुम्हारा मन उस पतंगे के समान है, जो धधकती ज्वाला में कूदता है, यह जानते हुए भी कि वह उसे जला देगी; फिर भी — दिल है कि मानता नहीं। और अंततः, यही कहते-कहते जीवन लीला समाप्त हो जाती है, पर मन तृप्त नहीं हो पाता…!!!

 

नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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