_जीवन में सफल होना है तो —_पुण्य, धर्म और परोपकार पर भरोसा करें.. अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
साबला
अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने श्री पी एम संत मावजी विद्यालय साबला डुंगरपुर राजस्थान में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि किस्मत की आज़माइश तो जुआ, सट्टा और शेयर बाज़ार में होती है..!
दो तत्व हैं — पुण्य और पाप। पुण्य करना सरल है, पाप करना कठिन है। पुण्य का प्रारंभ कठिन होता है, लेकिन अंत सुखद होता है; जबकि पाप का प्रारंभ सरल लगता है, पर उसका अंत दुखदायी होता है।


पाप का फल — अपमान, निंदा, बुराई और असफलता।
पुण्य का फल — सम्मान, प्रशंसा, यश, कीर्ति और लाभ ही लाभ।
पाप कर्म को कोई देखे या न देखे, लेकिन स्वयं से स्वयं का पाप कभी छिपता नहीं। अशुभ या गलत कार्य करते समय हमारी चेतना हमें रोकती है — यह गलत है। लेकिन मनुष्य अपने लोभ और स्वार्थ के कारण उस चेतना की आवाज को अनसुना कर देता है, और वही कार्य कर बैठता है, जो उसे नहीं करना चाहिए।
जब पाप का घड़ा फूटता है, तो मनुष्य पछताता है, रोता है, अफसोस करता है — लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। _“अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।”_ जिस कार्य को करने के बाद मन में अफसोस और पछतावा हो — समझना वह पाप है। और जिस कार्य को करने के बाद मन प्रसन्न हो जाए, मन मयूर नाच उठे, और रोम-रोम पुलकित हो उठे — समझना वह पुण्य है।
दिन की सफलता और रात के सुकून के लिए ये चार नियम अपनाएँ —
सोने का नहीं, उठने का समय निश्चित करें।
मोबाइल को बेडरूम के बाहर चार्ज पर रखें।
बेडरूम में ऑफिस या व्यापार का कोई कार्य न करें।
सोने से पहले वातावरण को शांत रखें, माता-पिता, गुरु और परमात्मा को धन्यवाद दें, और 100 से 1 तक मन ही मन उलटी गिनती करें (बिना होंठ और जीभ हिलाए)।फिर देखें —जीवन में अद्भुत परिवर्तन…
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
