गुरुदेव के चरणों में समर्पित भावना सेभव्य मूर्ति निर्माण – श्री गुप्तिनंदीजी महामस्तकाभिषेक के अवसर पर श्रद्धालु भावविभोर हुए…

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गुरुदेव के चरणों में समर्पित भावना सेभव्य मूर्ति निर्माण – श्री गुप्तिनंदीजी महामस्तकाभिषेक के अवसर पर श्रद्धालु भावविभोर हुए…

धर्मतीर्थ (प्रतिनिधि):

मेरे सद्गुरु गणाधिपति, गणधराचार्य श्री कुंथुसागरजी गुरुदेव का 28 वर्षों बाद धर्मतीर्थ में आगमन हुआ है। उनके पवित्र चरणों में समर्पण भाव से 51 फीट ऊंची विशालकाय सिद्ध परमेष्ठी मूर्ति के निर्माण का स्वप्न साकार हुआ। यह कार्य भगवान ने मेरे माध्यम से संपन्न कराया। इस कारण धर्मतीर्थ का यह पावन क्षेत्र और भी अधिक पवित्र हो गया है। ऐसा प्रतिपादन क्रांतिकारी राष्ट्रसंत प्रज्ञायोगी दिगंबर जैनाचार्य श्री गुप्तिनंदीजी गुरुदेव ने किया।

 

 

धर्मतीर्थ में आयोजित 6 दिवसीय पंचकल्याणक प्रतिष्ठापना एवं महामस्तकाभिषेक महोत्सव के समापन अवसर पर श्री गुप्तिनंदीजी महाराज बोल रहे थे। उन्होंने आगे कहा कि ऐसा क्षण शताब्दी में एक बार आता है। कृतज्ञता के इस क्षण में हमारे बीच की अद्वैत भावना ने मुझे शक्ति प्रदान की। महोत्सव के समापन अवसर पर दो गुरुदेवों को एक ही मंच पर देखकर उपस्थित जैन दिगंबर श्रद्धालु भावविभोर हो गए। 28 मार्च से शुरू हुए इस महोत्सव का समापन मोक्षकल्याणक विधि के साथ हुआ।

 

 

जब 51 फीट ऊंची विशाल मूर्ति का महामस्तकाभिषेक किया गया, तब जयघोष से पूरा वातावरण गूंज उठा। दो दिनों तक वर्षा देवता ने भी जलवर्षा कर मानो नमन किया। इस अवसर पर मंच पर पंचकल्याणक प्रतिष्ठापना महोत्सव समिति के अध्यक्ष संजय पन्नालाल पापडीवाल, कार्याध्यक्ष चंद्रशेखर चांदमल पाटणी, स्वागताध्यक्ष जिनेंद्र बाकलीवाल, कोषाध्यक्ष राजेंद्र पाटणी, महामंत्री पवनकुमार पापडीवाल, मार्गदर्शक गुलाबचंद कासलीवाल, शरद जालनापुरकर तथा अन्य अनेक सहयोगी उपस्थित थे।

छह दिनों तक चले पंचकल्याणक एवं महामस्तकाभिषेक महोत्सव का (दि. 2) को भावपूर्ण वातावरण में समापन हुआ। मोक्षकल्याणक सम्पन्न हुआ। प्रातःकाल शांतिहवन, विश्वशांति महायज्ञ एवं दशांश पूर्णाहुति संपन्न हुई। इसके बाद शांतिधारा, नित्यपूजा और केवलज्ञान कल्याणक पूजा की गई। कैलाश पर्वत पर भगवान के मोक्षगमन एवं गणधराचार्य श्री का पूजन तथा आचार्य संघ का मंगल प्रवचन हुआ। सुबह 9 बजे सिद्ध भगवान की प्रतिष्ठापना विधि सम्पन्न हुई। दोपहर 12:50 बजे मिथुन लग्न के नवांश मुहूर्त में भगवान विराजमान हुए। महामस्तकाभिषेक, ध्वज अवरोहण, पुण्याहवाचन और शांतिपाठ विसर्जन के साथ महोत्सव का समापन हुआ। यह जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियुष कासलीवाल ने दी।

 

तीन क्रेनों की सहायता से महामस्तकाभिषेक

दोपहर 3:30 बजे महामस्तकाभिषेक प्रारंभ किया गया। तीन क्रेनों की सहायता से 51 फीट ऊंची विशाल सिद्ध परमेष्ठी मूर्ति पर पवित्र जल, विभिन्न रस और पंचामृत से अभिषेक किया गया। जब जैनाचार्य श्री गुप्तिनंदीजी गुरुदेव ने क्रेन से अभिषेक किया, तब श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक जयघोष किया। शांतिधारा करने के लिए श्रद्धालुओं में प्रतिस्पर्धा देखने को मिली। प्रतिष्ठाचार्य पं. प्रदीप मधुर एवं उनके सहयोगियों ने मंत्रोच्चार किया।

 

भोजनदाताओं को मिला भरपूर आशीर्वाद

छह दिनों तक चले इस महोत्सव में सुबह चाय-नाश्ता तथा दोपहर और शाम को स्वादिष्ट भोजन की उत्तम व्यवस्था की गई थी। श्री किशोर एवं श्रीमती ममता पांडे, श्री नरेंद्र एवं श्रीमती मंजिरी काला, श्री महेंद्र एवं श्रीमती रुक्मिणी सोनी, श्री विजय एवं श्रीमती सुवर्णा काला, श्री महावीर एवं श्रीमती डॉली जैन परिवार—इन भोजनदाताओं को सभी श्रद्धालुओं से “अन्नदाता सुखी भव” का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

 

 

प्रतिदिन विभिन्न मिठाइयों, विविध व्यंजनों और उपवास हेतु विशेष फलाहार की व्यवस्था की गई थी। राज्य, देश एवं विदेश से आए श्रद्धालुओं ने तृप्त होकर संतोष व्यक्त किया। इस अवसर पर पंचकल्याणक अध्यक्ष संजय पापडीवाल ने शासन, प्रशासन, ग्रामवासियों एवं भक्तों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सभी के सहयोग से ही यह कार्य सफल हो पाया। उन्हें गणाधिपति गणधराचार्य कुंथुसागरजी महाराज का विशेष आशीर्वाद प्राप्त हुआ। पांच आचार्यों एवं अनेक संतों की उपस्थिति में दिगंबर जैनाचार्य गुप्तिनंदीजी गुरुदेव ने यह महान कार्य संपन्न किया। संपूर्ण पंचकल्याणक समिति उनके चरणों में नतमस्तक है—ऐसे भावपूर्ण उद्गार उन्होंने व्यक्त किए।

        नरेंद्र अजमेरा पीयूष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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