इस पत्थर की कीमत तुम क्या जानो जैन बाबू
इसकी कीमत चाहे लाख में लगाओ या करोड़ो में
पर इस पत्थर को मैं तो नहीं देने वाला…..पटेल साहब
जी हां , एक पत्थर जिसकी कीमत मुश्किल से ज्यादा से ज्यादा 200 से 300 रूपये होगी पर बुंदेलखंड में एक व्यक्ति इस है जो इसे 35 लाख रूपये तक में किसी को दे नहीं रहा….क्या पत्थर में कोई जादू है , या फिर पत्थर कोई मूल्यवान धातु सोने – चांदी का बना हुआ है ,या है इस पत्थर का रहस्य आइए जानते है इस आर्टिकल में
अगर आपको इस पत्थर का रहस्य जानना है तो एक पात्र से आपका परिचय कराना पड़ेगा क्योंकि उस पात्र के बिना यह कहानी काल्पनिक लगेगी आपको तो चलिए जानते है उनके बारे में जैन धर्म के दिगंबर सम्प्रदाय के महान ऋषिराज, अद्भुत योगी , आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज जिनके बारे में आप गूगल करेंगे तो सारी जानकारी मिल जाएगी लेकिन कुछ जानकारी मैं दिए देता हूं सबसे पहले तो आपको पता होगा कि दिगंबर संत जो होते है वो सम्पूर्ण विश्व में नग्न विचरण करते है चाहे सर्दी हो गर्मी हो या बरसात हो अपने शरीर के ऊपर एक इंच भी कपड़ा नहीं ढकते , जहां भी उनको जाना हो पैदल ही जाते है चाहे कितनी भी दूर जाना हो , कभी किसी भी तरह का साधन का उपयोग नहीं करते..दिन में एक बार भोजन ओर एक बार पानी लेते है , अपने बाल यानि कि केश खुद अपने हाथों से उखाड़ते हैं कभी किसी नाई या सैलून में नहीं जाते अपने बाल अपने हाथों से उखाड़ कर अलग करते है ऐसे अनेक दिंगबर मुनिराज के गुरु हैं हमारे विद्यासागर जी महाराज
अब उनके जीवन के बारे में ओर लेखों में बात करते करेंगे

अभी कहानी पर वापस लौटते है कुंडलपुर जैन तीर्थ से आचार्य श्री का विहार दमोह पथरिया मार्ग की ओर हुआ , दमोह पथरिया मार्ग पर एक गांव पड़ता है सेमरा , जब दमोह पथरिया मार्ग से विहार हो रहा था तो 27 जून 2106 की बात है आचार्य श्री विहार करते हुए सेमरा गांव पहुंचे , एक व्यक्ति है बलराम पटेल सेमरा गांव के ही रहने वाले है वह अपने खेत के पास ही एक चाय की छोटी सी दुकान यानि गुमटी खोले हुए हैं आचार्य श्री विहार करते करते सेमरा गांव तक पहुंचे उन्होंने सोचा थोड़ा रुककर विश्राम यानि कि बैठ लिया जाए तो वह चलते चलते पटेल जी की दुकान तक पहुंचे और दुकान के पास रखे एक पत्थर ( बुंदेली में कहें तो फरसी) पर आचार्य श्री बैठ गए और एक निर्ग्रन्थ मुनि के साथ इतना बड़ा हुजूम देखकर वो समझ गए कि ये कोई साधारण संत तो नहीं है आचार्य श्री कुछ देर वहां बैठे रहते है ओर फिर जब जाने लगते है तो बलराम पटेल जी अपने पूरे परिवार के साथ उनसे आशीर्वाद लेते है ओर आचार्य श्री चले जाते है उनके जाने के बाद जब जैन समाज के लोगों ने उस पत्थर को खरीदने के बोली लगाई किसी ने कहा 1 लाख , किसी ने कहा 5 लाख , किसी ने कहां 21 लाख , किसी ने कहा 35 लाख अब उस पत्थर की कीमत जो 5 मिनट पहले कोई 100 रूपये में भी नहीं खरीदता उसकी कीमत 35 लाख रूपये हो गई थी लेकिन पटेल साहब की आस्था का क्या कहना उन्होंने वो पत्थर जिसकी कीमत शून्य थी और वही पत्थर अब 35 लाख रूपये में बिकने को तैयार था लेकिन पटेल साहब ने वो पत्थर नहीं बेचा ये बात भारत के लोगों की धर्म के प्रति गूढ आस्था को प्रकट करती है वो पत्थर आज भी पटेल साहब के घर में है ओर आज भी उनक परिवार उस पत्थर की पूजा करता है निरंतर 10 साल से रोज सुबह उस पत्थर की पूजा होती है जिस पर वो अद्भुत योगी,महान संत हमारे आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज बिराजे थे


17-18 फरवरी के दरम्यानी रात को आचार्य श्री ने अपना नश्वर शरीर त्याग कर मोक्ष मार्ग को चले गए , आचार्य श्री ने अपनी देह समाधिमरण पूर्वक त्याग…जिसमें जब साधु को आभास होने लगता है कि मेरी मृत्यु अब निकट है तो वह धीरे धीरे सातों प्रकार के आहार का त्याग करते हुए अपनी मृत्यु को प्राप्त होकर अपना जीवन सफल बनाता है…
यह कहानी जो मैने आपको बताई यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है दैनिक भास्कर जो देश का एक प्रतिष्ठित अखबार है उसमें 19 फरवरी 2026 को यह घटना छपी थी जिसका मैने विस्तार पूर्वक वर्णन किया है…..
धन्य है ऐसे ऋषिवर और धन्य है इस देश के लोगों की आस्था
जो नामुमकिन को भी मुमकिन बना देती है
साभार – तीर्थोदय वंदन संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
