भूगर्भ से प्रकट प्रभु आदिनाथ का अद्भुत अतिशय
कचनार आचार्य भगवंत108 श्री विद्यासागर जी महाराज के वरदान और आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के आशीर्वाद से मुनि श्री दुर्लभ सागर जी महाराज के ससंघ सानिध्य में अलौकिक अनुभूति अशोकनगर के समीप स्थित कचनार की पावन धरा एक बार फिर आध्यात्मिक स्पंदन से भर उठी, जब भूगर्भ से प्राप्त प्राचीन आदिनाथ भगवान की दिव्य प्रतिमा का विधिपूर्वक जीर्णोद्धार कर पुनः प्रतिष्ठापन किया गया ।
वर्षों तक भूमिगत रहने के बाद जब यह प्रतिमा प्रकाश में आई, तभी से श्रद्धालुओं के हृदय में इसे लेकर एक विशेष श्रद्धा और भाव उमड़ पड़ा था।
सम्पन्न हुए इस भव्य पंचकल्याणक महोत्सव में जब वेद-मंत्रों, मुनि श्री दुर्लभ सागर जी के सान्निध्य में और हजारों भक्तों की उपस्थिति में प्रभु को पुनः विराजमान किया गया, तब वातावरण स्वयं ही तीर्थमय हो गया ।
ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं समय ने ठहरकर इस क्षण का स्वागत किया हो ।


प्रतिष्ठा के उपरांत कल सायंकाल एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला । उपस्थित श्रद्धालुओं के अनुसार ऐसा प्रतीत हुआ मानो प्रभु की प्रतिमा पर स्वयं जल की धार प्रवाहित हो रही हो जैसे कोई अदृश्य शक्ति अभिषेक कर रही हो । देखते ही देखते यह समाचार पूरे परिसर में फैल गया और भक्त भाव विभोर होकर प्रभु के जयघोष में लीन हो गए ।।

कई श्रद्धालुओं ने इसे प्रभु का अतिशय बताया, तो कुछ ने इसे आस्था का दिव्य अनुभव कहा । वातावरण में ऐसी अलौकिक शांति और कंपन था कि उपस्थित जनों की आँखें श्रद्धा से नम हो उठीं ।


यह घटना केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि विश्वास और भक्ति की शक्ति का प्रतीक बन गई । जैन परंपरा में आदिनाथ भगवान त्याग, तप और आत्मजागरण के प्रतीक माने जाते हैं ।
जब उनकी प्राचीन प्रतिमा भूगर्भ से प्राप्त हुई थी, तभी से यह स्थान विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाने लगा था । अब पुनः प्रतिष्ठा के तुरंत बाद ऐसा अद्भुत अनुभव होना, भक्तों के लिए एक दिव्य संकेत के रूप में देखा जा रहा है । श्रद्धालु इसे प्रभु की कृपा और इस पावन भूमि की पवित्रता का प्रमाण मान रहे हैं ।
कचनार की यह घटना केवल स्थानीय चर्चा नहीं रही, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी गहन श्रद्धा का विषय बन गई है । लोग दूर-दूर से दर्शन हेतु पहुँच रहे हैं । कई भक्तों का कहना है कि प्रतिमा के समक्ष खड़े होते ही एक विशेष शांति का अनुभव होता है, मानो आत्मा स्वयं भीतर झांकने लगती हो । चाहे इसे आस्था कहें, आध्यात्मिक ऊर्जा कहें या प्रभु का अतिशय इतना निश्चित है कि इस घटना ने जनमानस में धर्म के प्रति विश्वास को और सुदृढ़ किया है ।
भूगर्भ से प्रकट हुए प्रभु आदिनाथ का यह पुनर्जन्म समान प्रतिष्ठा समारोह और उसके उपरांत अनुभव किया गया यह दिव्य अभिषेक दृश्य, कचनार को एक बार फिर आध्यात्मिक मानचित्र पर विशेष स्थान दिला रहा है ।
यह घटना हमें स्मरण कराती है कि जब श्रद्धा सच्ची हो, तो पत्थर में भी परमात्मा सजीव अनुभव होते हैं, और जब भाव निर्मल हों, तो चमत्कार केवल देखे नहीं, अनुभूत भी किए जाते हैं ।
आप भी ऐसी चमत्कारिक प्रतिमा के दर्शन करने एक बार ग्राम कचनार अवश्य पधारें अशोकनगर से तूमेन होते हुऐ 20 किलो मीटर की दूरी पर स्थित है । संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
