जिनकी आशा गुरु पर टिकी होती है, उनका जीवन कभी डगमगाता नहीं” — मुनि श्री संभवसागर महाराज

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जिनकी आशा गुरु पर टिकी होती है, उनका जीवन कभी डगमगाता नहीं” — मुनि श्री संभवसागर महाराज

विदिशा।

श्री शांतिनाथ जिनालय, स्टेशन जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसागर महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि “जिनकी आशा गुरु पर टिकी होती है, उनका जीवन कभी डगमगाता नहीं।” अपने ओजस्वी प्रवचन में उन्होंने कर्म सिद्धांत, गुरु आज्ञा और जीवन में सजगता के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

 

कर्म का सिद्धांत: निष्पक्ष ‘सुपर कंप्यूटर’ की तरह

मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य संसार में अनेक प्रकार के मुखौटे पहन सकता है और दूसरों की आंखों में धूल झोंक सकता है, किंतु कर्म की न्याय व्यवस्था को कभी धोखा नहीं दे सकता। उन्होंने कर्म सिद्धांत की तुलना ए.आई. सुपर कंप्यूटर से करते हुए कहा कि इसकी कोडिंग पूर्णतः निष्पक्ष है, जिसमें हमारे प्रत्येक विचार, शब्द और कर्म स्वतः दर्ज होते रहते हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि दुकान, घर या समाज की नजरों से व्यक्ति स्वयं को छिपा सकता है, पर कर्म के लेखे से नहीं। “कर्म का लेख न मिटता है, न बदलता है और न ही किसी बाहरी आडंबर से प्रभावित होता है,” उन्होंने कहा।

धर्म क्षेत्र में असावधानी अधिक गंभीर

मुनि श्री ने कहा कि बाहरी पापों का प्रायश्चित संभव है, किंतु धर्म क्षेत्र, मंदिर या पवित्र भावों के मध्य की गई असावधानी कर्म लेख में अमिट रूप से अंकित हो जाती है।

उन्होंने लोकप्रसिद्ध उक्ति उद्धृत की— “कोई लाख करे चतुराई, कर्म का लेखा मिटे न भाई।”

उनका कहना था कि जीवन में सजगता, संयम और सत्यनिष्ठा अत्यंत आवश्यक हैं, क्योंकि कर्मों की “कोडिंग” व्यक्तिगत होती है और उसका फल स्वयं को ही भोगना पड़ता है।

गुरु वाणी: कड़वी दवा, पर अमृत फल

गुरु की वाणी के संदर्भ में मुनि श्री ने कहा कि गुरु का उपदेश कभी-कभी कड़वी दवा जैसा प्रतीत होता है, किंतु उसका उद्देश्य आत्मा का उपचार करना होता है।

“कांटा निकालते समय क्षणिक पीड़ा होती है, पर बाद में राहत मिलती है; वैसे ही गुरु की कठोर प्रतीत होने वाली वाणी हमारे भीतर के क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी कांटों को निकालने के लिए होती है। बुरा लगना ही उपचार की शुरुआत है,” उन्होंने कहा।

मानव जन्म दुर्लभ, अवसर भी बड़ा — मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज

धर्मसभा में उपस्थित मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज ने कहा कि यदि मन पर जमे कुसंस्कारों को बार-बार दोहराया जाएगा तो आत्मा कभी निर्मल नहीं हो सकेगी।

उन्होंने बताया कि चौरासी लाख योनियों के चक्र के बाद प्राप्त मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ है। यदि अब भी आत्मजागरण नहीं हुआ, तो पुनः उसी चक्र में भटकना पड़ेगा।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “जितनी बड़ी दुकान, उतना बड़ा फायदा या उतना ही बड़ा नुकसान।”

धर्म का अवसर जितना बड़ा है, जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। यदि मन को संयम और साधना में स्थिर नहीं रखा, तो पतन भी उतना ही गहरा हो सकता है।

गुरु आज्ञा में ही कल्याण

दीक्षा काल के प्रसंग साझा करते हुए मुनि श्री संभवसागर महाराज ने बताया कि जब गुरुदेव सैकड़ों किलोमीटर दूर विहार का संकेत देते थे, तब प्रारंभ में मन में अनेक प्रश्न उठते थे, किंतु समय के साथ परिणाम देखकर समझ आता था कि गुरु का निर्णय दूरदर्शी और जनकल्याणकारी होता है।

उन्होंने कहा, “गुरु जो कहें, उनके आदेश का उल्लंघन मत करो। यदि यह मंत्र अपना लिया, तो जीवन आनंदमय हो जाएगा।”

श्रद्धा ही स्थिरता का आधार

प्रवचन के अंत में उन्होंने कहा कि कठिनाइयाँ जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं, किंतु जिनकी श्रद्धा अटल है और जिनकी आशा गुरु पर टिकी है, उनका जीवन कभी डगमगाता नहीं।

धर्मसभा की जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने देते हुए बताया कि मुनि श्री के आध्यात्मिक प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8:45 बजे आयोजित हो रहे हैं।

संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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