दीक्षा से मंच, लंच,ड्रेस और एड्रेस बदल जाता हैं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी
पदमपुरा जयपुर निवासी 78 वर्षीय 5 प्रतिमाधारी श्री मुन्नालाल ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से मुनि दीक्षा ग्रहण की स्टेज आचार्य श्री एवं अन्य साधुओं ने दीक्षार्थी के केश लोच किए इस अवसर पर मुनि श्री हितेंद्र सागर जी के प्रवचन हुए राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने सिद्ध हस्त कर कमलों से मस्तक ओर हाथों पर जैनत्व ओर मुनित्व के 28 संस्कार किये। दीक्षा पश्चात नूतन मुनि श्री गुणोदय सागर को को पिच्छी, कमंडल और शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य पूर्व परिजनों को प्राप्त हुआ।इस अवसर परआचार्य श्री वर्धमान सागरजी ने धर्म सभा में बताया कि पदमपुरा अतिशय क्षेत्र में वर्ष 2016 ओर वर्ष 2026 में हमारे द्वारा पंच कल्याणक हुए और तीन बार दीक्षा हुई।दीक्षा का अर्थ है इच्छाओं का दमन दीक्षा याने लंच और मंच का बदल जाना दीक्षा मतलब ड्रेस और एड्रेस का परिवर्तन हो जाना विचारों में क्रांति को दीक्षा कहते हैं आमूलचूल परिवर्तन को दीक्षा कहते हैं जैनियों की दीक्षा राग द्वेष निवृत्ति के लिए होती है दीक्षा पूर्व संस्कार को तोड़ने का नाम है दीक्षा संसार से मुख्य मोड़ कर अंतर बुक दृष्टि हो जाने को कहते हैं अलौकिक ता से दूर आध्यात्मिक नगर के नजदीक रहना दीक्षा है दीक्षा रूप वेश लिंग धारण करने वाला से दुखों का छुटकारा नहीं मिलता भाई यह रूप के साथ अंतरंग में अहिंसा संयम वक्त अपरूप परिणामों का होना भी उतना ही आवश्यक है दीक्षा में द्रव लिंग की मुख्यता बाहर से दिखाई देती है लेकिन अंतरंग में दीक्षार्थी के भावों में राग द्वेष कसाए परिणामों का उपशम कम होना भी उतना ही प्रधान है गृहस्थ आदमी परिग्रह संभालता है परिवार संभालता है पर्याय संभालता है लेकिन परिणामों को नहीं संभालता दीक्षार्थी यह साधु परिणामों को संभालते हैं
राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
