मातृ दिवस पर विशेष
एक माँ सृष्टि का सबसे बड़ा शिक्षालय है
भारतीय संस्कृति में माँ का स्थान पूजनीय वंदनीय है। माँ की महिमा गरिमा को पृथ्वी पर जितने वन उपवन है उसकी कलम बना ली जाए जितने जलाशय है उसकी स्याही बना ली जाए तब भी माँ की महिमा गरिमा को नही लिख पाएंगे।किसी ने कितना खूबसूरत लिखा है “मेरी जिंदगी में गर खुशीयों का बसर है इसमे मेरी माँ की दुवाओ का असर है।”*
एक माँ इस सृष्टि का सबसे बड़ा शिक्षालय है । 100 शिक्षक मिलकर भी वो संस्कार नहीं डाल पाते जो एक बच्चे में डाल देती है। माँ, महात्मा और परमात्मा तीनों का जीवन में बड़ा महत्व है माँ बचपन सवार देती महात्मा जवानी सुधार देता है ओर परमात्मा बुढ़ापा सुधार देता है। माँ ही किसी भी बच्चे का जीवन नर्क ओर स्वर्ग बनाने की अदभुत क्षमता रखती है। माँ को धरती की उपमा भी दी जाती है। धरती जिस तरह से धर्य को धारण करती है उसी प्रकार एक माँ भी विपरीत परिस्थितियों में धर्य को धारण करती है। जितने भी ऋषि, मुनि, संत, दिव्य पुरुषों का अवतरण भारत वसुंधरा पर हुआ है । उनकी माताओ के जीवन चरित्र जरूर पड़ना चाहिए। माँ से जीवन है हमारा अस्तित्व है वजूद है । माँ नही तो कुछ नही। मां के द्वारा बचपन में दिए गए सद संस्कार बचपन की दहलीज पार करने के बाद भी जो कि त्यों बने रहते हैं।मुझे वो गीत तू कितनी अच्छी है तू तू कितनी प्यारी है ओ माँ जब सुनता हूँ तो मेरी आँखें भर आती है। जिनके पास पिताजी ओर माता जी दोनो है वो इस सृष्टि में सबसे बड़े सौभाग्यशाली है। कहते है हर सफल व्यक्ति के पीछे एक नारी का हाथ होता है “यत्र नारिन्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता”। जहाँ नारियों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है पूजा जाता है वहाँ देवताओं का वास होता है। मातृ दिवस के स्वर्णिम सु अवसर पर में सभी माताओं के पावन चरणों मे नमन वंदन करता हूं।
प्रस्तुतिराष्ट्रीय मीडिया प्रभारी*
पारस जैन “पार्श्वमणि” पत्रकार कोटा (राज)9414764980
