स्वय का अध्यन करना स्वाध्याय है आचार्य कनकनंदी

धर्म

स्वय का अध्यन करना स्वाध्याय है आचार्य कनकनंदी
सागवाड़ा
समता शिरोमणि वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि जिस प्रवचन से जिस धार्मिक क्रिया से भावना पवित्र हो, भावना उत्कृष्ट हो वह प्रभावना हैं। स्व का अध्ययन करना स्वाध्याय हैं।

 

 

 

जिनवाणी ही पवित्र तीर्थ है। जो सम्यक ज्ञान से परिपूर्ण है। फोटोन ही प्रकाश है विद्युत चार्ज के बिना बल्ब प्रकाश नहीं देता वैसे ही हममें प्रकाश रूपी ऊर्जा ज्ञान रूपी ऊर्जा मां जिनवाणी से ही प्राप्त होती है। मां जिनवाणी के दिव्य प्रकाश से ही अरिहंत सिद्ध बन सकते हैं। चतुर्थ काल में तथा वर्तमान में साधुओं को ज्ञान का प्रकाश जिनवाणी से ही प्राप्त होता है।

समस्त लोक की शुद्धि का कारण जिनवाणी ही है। भव्य जीवो के आनंद को समुद्र की तरह बढ़ाने वाली जिनवाणी है। धर्म तीर्थ प्रवर्तन जिनवाणी से दिव्य ध्वनि से ही होता है। जिनेंद्र भगवान की वाणी जिनवाणी हैं। जिनवाणी ही मति ज्ञान को पवित्र करती है। अवधी ज्ञान मन पर्यय ज्ञान केवल ज्ञान सबका केंद्र श्रुत ज्ञान है। श्रुत ज्ञान बिना कोई सम्यक दृष्टि ज्ञानी ध्यानी तपस्वी साधु बनकर श्रेणी आरोहण नहीं कर सकता है।

जिनवाणी मां सरस्वती मां आपकी कृपा से ही समस्त गुण समस्त पद समस्त सुख प्राप्त होता है। अनेक भव के संचय किए हुए पाप रूपी पर्वत को नष्ट करने वाली जिनवाणी ही है। जिनवाणी की आराधना से पाप रुपी पर्वत का विध्वंस हो जाता है। जिनवाणी के विवेक रूपी वज्र से पाप रूपी पर्वत को तोड़ा जाता है। समस्त आध्यात्मिक उपलब्धियां जिनवाणी से ही होती हैं। आत्म विकास के समस्त कार्य जिनवाणी से ही संभव है।

 

आत्मज्ञान बिना शरीर व इंद्रियों का विकास होता है परंतु आत्मा का विकास आध्यात्मिक ज्ञान से ही होता है। जिनवाणी से ही आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है। आचार्य श्री ने जिनवाणी पढ़ने का फल बताते हुए कहा कि जिनवाणी पढ़ने से व्यक्ति प्रज्ञा अतिशयोक्त अर्थात बुद्धि का विकास होता है। वह परम संवेग को धारण करने वाला होता है। उसमें संशय नहीं रहता है निर्मल परिणामी , पवित्र भावना से युक्त होता है। जिनवाणी के स्वाध्याय से शंका कुश़का नष्ट हो जाती है। प्रशस्त अतिशय प्राप्त होता है। परम संवेग भाव जागृत होता है। अर्थात वह पाप से डरने लगता है निंदा करने से क्रोध करने से आदि कषाओं से डरने लगता है।

 

 

जो स्वयं को जानता है वह आत्मा को जानता है वह संपूर्ण आगम को जानता है आत्मा को जानने वाला अशुची शरीर को भी जानता है तथा आत्मा के शुद्ध स्वरूप को भी जानता है वह कुछ ही भव में शुद्ध बन जाता है। जो आत्मा को जानता है वह समस्त अनात्मक विश्व को भी जानता है। जो एक आत्मा को जानता है वह सभी को जानता है एक आत्मा को नहीं जानने वाला कुछ नहीं जानता है आचार्य श्री प्रश्न करते हैं कि केवल आत्मा को ही क्यों जानना चाहिए आत्मा का ही श्रद्धान क्यों करना चाहिए आत्मा का ज्ञान क्यों आवश्यक है इसके समाधान में आचार्य श्री ने बताया कि स्वयं की उपलब्धि संपूर्ण विश्व की उपलब्धि है अरिहंत बनना अर्थात संपूर्ण ब्रह्मांड को जानना।

विजयलक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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