परमात्मा के चरणों में कोई आरक्षण नहीं, सभी के लिए एक सूत्र है: आचार्य श्री मंगल धर्मसभा में आचार्यश्री निर्भय सागरजी ने जीवन की सुरक्षा और संस्कारों में पर दिए उपदेश

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परमात्मा के चरणों में कोई आरक्षण नहीं, सभी के लिए एक सूत्र है: आचार्य श्री मंगल धर्मसभा में आचार्यश्री निर्भय सागरजी ने जीवन की सुरक्षा और संस्कारों में पर दिए उपदेश

गुना

चौधरी मोहल्ला स्थित पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित मंगल धर्मसभा में मंगलवार को आचार्य श्री श108निर्भय सागरजी महाराजएवं निर्यापक श्रमण मुनिश्री शिवदत्त सागरजी महाराज ने जीवन की सुरक्षा और संस्कारों पर उपदेश दिए।

 

 

आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि संसार की भौतिक वस्तुएं मृत्यु के समय काम नहीं आतीं, केवल धर्म ही आत्मा का कल्याण करता है। आचार्य श्री ने विशेष रूप से कहा कि परमात्मा के चरणों में आरक्षण नहीं है। कोई भी जाति संप्रदाय का व्यक्तिहो, सभी के लिए एक ही सूत्र है, जिसे जैन धर्म स्वीकार करता है। सामने वाले की निंदा करोगे तो भी कर्मों का बंध होगा सुनोगे तो भी कर्मों का बंध निश्चित है।विश्व और देश में शांति तब तक स्थापित नहीं हो सकती, जब तक हम भगवान महावीर के अनेकांत को नहीं अपना लेते।

 

 

सुरक्षा के 4 शाश्वत स्थान

आचार्य श्री ने प्रवचन में बताया के लिए ठंड में ऊनी कपड़े, गर्मी में एसी, और आत्मरक्षा के लिए बंदूक, पिस्तौल या सुरक्षा गार्ड रखता है, परंतु मौत आने पर यह सभी यही परमात्मा के चरणों में कोई आरक्षण नहीं, सभी के लिए एक सूत्र है: आचार्य श्री मंगल धर्मसभा में आचार्यश्री निर्भय सागरजी ने जीवन की सुरक्षा और संस्कारों में पर दिए उपदेश रह जाता। इस भव और आगामी भवों मेंसुरक्षा के चार प्रमुख स्थान बताए पहली अरिहंत भगवान की शरण,दूसरी आचार्य – उपाध्याय और साधु की शरण तीसरी जिनवाणी मां की शरण और आगम की शरण और चौथी जिनधर्म की शरण । इन चार शरणों में जाने वाला जीव ही संसार सागर से पार उतर सकता है।

     उन्होंने कहा मां बच्चे की पहली पाठशाला, पिता बीज समान संस्कारों पर प्रकाश डालते हुए महाराज श्री ने कहा कि माता-पिता को अपने बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण करना चाहिए। उन्होंने मां को बच्चे की प्रथम पाठशाला और पिता को बीज के समान बताया। आचार्य श्री ने चेतावनी देते हुए कहा कि जैसे संस्कार माता-पिता के होंगे, उनका सीधा प्रभाव बच्चों पर पड़ेगा। यदि पिता व्यसनी है, सिगरेट या जर्दा खाता है, तो बच्चा भी निश्चित। रूप से उन्हीं व्यसनों को अपनाएगा। यहां तक कि यदि पिता ने प्रेम विवाह (लव मैरिज) की है, तो बेटा भी उसी मार्ग पर चलेगा। इसलिए परिवार को धर्म से जोड़ने के लिए सबसे पहले माता-पिता को स्वयं धर्म के संस्कार धारण करने होंगे। 

 

आचार्य श्री ने वर्तमान समय की चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा कि आज पाश्चात्य संस्कृति कदम-कदम पर हमें पथभ्रमित करने के लिए तैयार खड़ी है। ऐसे कठिन समय में केवल सच्चे देव, शास्त्र और गुरु की शरण ही हमें सद्मार्ग दिखा सकती है। पंचम काल में आत्म-कल्याण का यही एकमात्र मार्ग है।

               संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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