दान के वो मायने खो देते हैं.. जो वक्त पर नहीं,, रो रोकर देते हैं..!  अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज 

धर्म

दान के वे मायने खो देते हैं,जो वक्त पर नहीं, रो-रोकर दिए जाते हैं। अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

औरंगाबाद / जयपुर

आज सुबह गायत्री नगर में उपस्थित गुरु-भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा—एक महिला किसी वृद्ध बाबा के पास गई और बोली,“बाबा, कोई ऐसी ताबीज लिखकर दीजिए, जिससे मेरे बच्चे रात को भूख से न रोएँ।”बाबा ने एक कागज़ पर कुछ लिखकर उसे दे दिया। महिला वह कागज़ लेकर चली गई।दूसरे दिन किसी ने उसके आँगन में पैसों से भरा एक थैला फेंक दिया। थैले में एक पर्ची भी थी, जिस पर लिखा था—

“खुद मेहनत करो।”

जैसे ही उसके पति ने वह पर्ची पढ़ी, उसने एक दुकान किराए पर ली और अपना व्यापार शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसका व्यापार बहुत अच्छा चलने लगा।

 

 

कहते हैं न—भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़कर देता है,

और जब लेता है तो कपड़े फाड़कर लेता है।लक्ष्मी छप्पर फाड़कर आने लगी।एक दिन अचानक उस महिला की नज़र अपने पुराने संदूक पर गई, जिसमें उसने बाबा द्वारा दिया गया मंत्र संभालकर रखा था। उसने वह परचा निकाला और जैसे ही पढ़ा, उसमें लिखा था—“जब पैसों की तंगी समाप्त हो जाए, तो सारा पैसा तिजोरी में रखने के बजायउसे ऐसे घर में डाल देना, जहाँ से रात को बच्चों के रोने की आवाज़ आती हो।”बात बहुत गहरी है—साहस ही हमें हमारी मंज़िल तक पहुँचाता है।इसलिए कहा गया है—हिम्मत करोगे तो हाथी भी बाँध लोगे,अन्यथा किस्मत में गधा भी नसीब नहीं होगा।

— नरेंद्र अजमेरा— पियूष कासलीवालऔरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी📞 9929747312

 

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