54 लाख का पैकेज छोड़कर ब्रह्मचारी बने पीयूष जैन की मुनि श्री सुधासागर महाराज के कर कमलों से होगी तप कल्याणक महोत्सव में दीक्षा
गोलाकोट
परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 सुधासागर महाराज के सानिध्य में 54 लाख का पैकेज छोड़कर संयम मार्ग की अग्रसर होने वाले ब्रह्मचारी पीयूष भया की दीक्षा होने जा रही है आज भया जी के कैशलोच भी संपन्न हुए।
जब 54 लाख का पैकेज छोड़, 24 वर्षीय इंजीनियर ने अपनाया था अशोकनगर का वह क्षण था वैराग्य के इन क्षणों आंसुओं से भीग उठा था अशोकनगर
वर्ष 2025 अक्टूबर माह का क्षण शहर का सुभाषगंज शाम एक ऐसे भावुक दृश्य का साक्षी बना था जिसे शब्दों में पिरोना आसान नहीं है। विशाल पांडाल में बैठे हजारों लोग उस क्षण को देखकर अपने आंसुओं पर काबू नहीं रख पाए थे,जब 24 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर पीयुष जैन ने संसार के मोह-माया, आकर्षण और भविष्य की सुनहरी राह छोड़कर वैराग्य का वरण किया था।
एक परिचय पीयूष जैन
पीयुष पुणे की एक प्रतिष्ठित कंपनी में कार्यरत थे, जहां उन्हें 54 लाख रुपए का पैकेज मिला था। मां-पिता ने बड़े अरमानों से उनका भविष्य संजोया था। मां सीमा जैन ने तो बेटे का विवाह भी सोच लिया था, दुल्हन तक तलाश ली थी। लेकिन जब पीयुष ने फोन कर कहा “मां, मैं अब आपके सामने आपका बेटा नहीं, बल्कि श्रमण जीवन के पथिक के रूप में खड़ा रहूंगा” तो मां का कलेजा चीर गया।
उन क्षणों में पिता श्री संजीव जैन भी अश्रुधारा रोक न पाए थे। उन क्षणों में
मां की आंखों से बहते आंसू जैसे एक-एक श्रोता के दिल में उतर रहे थे। महिलाओं का रुदन उस क्षण को और अधिक मार्मिक बना रहा था- जैसे उनके अपने घर का लाल बिदा हो रहा हो। विदुषी युवतियां भाई को विदा करती बहनों की तरह सिसक रही थीं, और युवक भी अपने आंसुओं को छिपा नहीं सके। पूरा पांडाल संवेदना और श्रद्धा से भीग उठा था।


यह आंसू एक दिन खुशी के आंसू बन जाएंगे मुनिश्री
उस बेला में निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 सुधासागर महाराज ने कहा था कि मां के यह आंसु एक दिन खुशी के आंसु बन जाएंगे।उस क्षण, जब पीयुष ने संघ में प्रवेश किया, श्रमण शिरोमणि,निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने कहा-“मैंने इस बालक को बहुत डराया था। कहा था कि मोक्ष का मार्ग आसान नहीं है, यह तलवार की धार पर चलने के समान है। लेकिन वैराग्य अपनाने में पीयूष भैया ने पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।निश्चित रूप से जब संसार के बंधन ढीले पड़ते है, तब ही जीव इस कठिन पथ पर बढ़ता है। उन्होंने कहा था आज दशहरे जैसे शुभ दिन पर इसने वैराग्य को अपनाया, यह केवल इसका नहीं,पूरे समाज का गौरव है। यह दृश्य केवल एक युवक निर्णय नहीं था यह उन असंख्य परिवारों की भी भावनाओं का संगम था, जो अपने बच्चों को दुनिया में आगे बढ़ते देखना चाहते हैं, परंतु जब वही संतान संसार छोड़ मोक्ष की ओर कदम बढ़ा देती है, तो आंसुओं और गर्व का संगम बह निकलता है। उस समय जिज्ञासा समाधान के प्रसिद्ध कार्यक्रम के बीच इस शाम पांडाल में कोई भी ऐसा नहीं था जिसकी आंखें सूखी रह गई हों। आंसुओं की नमी में वैराग्य की महिमा और त्याग का तेज मिलकर यह संदेश देरहा था कि – “जीवन का असली सुख त्याग में है, वैराग्य में है, और वही मार्ग अंततः आत्मा को परम शांति की ओर ले जाता है।” अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312



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