आचार्य श्री सुनील सागर महाराज ने गिरनार पर्वत की प्रथम टोंक पर खुले आकाश में किया केशलोच 

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आचार्य श्री सुनील सागर महाराज ने गिरनार पर्वत की प्रथम टोंक पर खुले आकाश में किया केशलोच

गिरनार  पावन पर्वत गिरनार जहां तीर्थंकर नेमीनाथ भगवान ने मोक्ष को प्राप्त किया ऐसे पावन तट पर आचार्य श्री 108 सुनील सागर महाराज ने केशलोच किया।

 

 

गिरनार पर्वत पर की पहली टोंक पर निर्ग्रन्थ संत खुले आकाश के बीच भीषण शीतलहर में बिना किसी औजार के हाथों से अपने केशो का लोचन किया सचमुच पांचम युग में एक उत्कृष्ट साधना है जो केवल जैन संत ही कर सकता है।

 

 

 

 

 

दिगंबर साधु समस्त परिग्रह से रहित होते है तथा अपने पास केवल एक मयूर पंख से बनी पिच्छी रखते है अतः बालों को हटाने के लिए वे उस्तरा आदि अपने पास नर्ही रख सकते व ना ही इनका प्रयोग कर सकते और चूंकि साधु स्वावलंबी होते है और उनकी चर्या सिंह के समान होती है इस लिए बाल हटाने के लिए किसी का सहारा भी नही लेते। इस लिए वे अपने हाथों से बालों को नोंच कर उखाड़ते है।

 

 

 

 

 

 

इस क्रिया को केश लोंच कहते है। वैसे केशलोंच परिषह सहन करने के लिए भी जरूरी होता है। दिगम्बर मुनि महाव्रती होते है और 22 परिषह को सहज ही सहन करते है तथा 28 मूल गुणों का पालन करते है जिसमे हाथों से केशलोंच करना एक आवश्यक क्रिया है। और चूंकि केशलोंच करने से भी अनेक परजीवी छोटे जीवों की विराधना होती है जिसके प्रायश्चित स्वरूप माताजी महाराज जी उस दिन निराहार रह कर उपवास भी रखते हैं।

 

 

 

अतः दिगम्बर मुनि अहिंसा की जीवंत छवि होते है जिनसे किसी भी जीव को किसी तरह का कोई भय नही रहता है। मुनि स्वयम भी अभय होते है और दूसरों को भी अभय ही प्रदान करते है।

 

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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