“हमारी सोच व्यक्ती निष्ट न होकर वस्तुनिष्ट हो गई है” इसीलिये पारिवारिक संबंधों में खटास है -मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज
(जबलपुर)
“तकनीकी” के इस युग में हमारा संपर्क पूरे संसार से तो बहुत बड़ा है,लेकिन पारिवारिक संबंध बहुत संकुचित होते जा रहे है”उपरोक्त उदगार भावनायोग प्रणेता मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने “रिश्तों के डोर में “अपेक्षा और प्रेम” विषय पर बोलते हुये कहे।
उन्होंने कहा एक और तो मनुष्य चांद पर बसने कि बात करता है, वही उसके आपसी रिश्तों में टूटन महसूस हो रही है, उन्होंने कहा कि आजकल मकान तो बहुत बड़े बना लिये है,लेकिन इंसान का मन बहुत छोटे होता जा रहा है,उसका सबसे बड़ा कारण है हमारी सोच जो कि व्यक्ती निष्ट न होकर वस्तुनिष्ट हो गई है।





मुनि श्री ने कहा कि “रिश्ते बनाये जाते है, संबंधों की डोर से,लेकिन रिश्तों को निभाया जाता है भावनाओं से,उन्होंने कहा कि “संबंधों जोड़कर रिश्ता बनाना एक दिन की बात है,पर भावनाओं को समझते हुये उसे निभाना जीवन भर की बात है”जिसके प्रति समर्पण होता है,वहा धन की कोई कींमत नहींं होती वहा पर त्याग की भावना होती है।और जिसके प्रति केवल अपेक्षा मूलक बात होती है,वहा केवल जोड़ घटाव होता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
