जीवन में आत्मा पतंग है. संयम की डोरी हो तो कोई नहीं काट सकता: आचार्य श्री निर्भय सागर महाराज

धर्म

जीवन में आत्मा पतंग है. संयम की डोरी हो तो कोई नहीं काट सकता: आचार्य श्री निर्भय सागर महाराज
गुना
स्थानीय महावीर भवन में आयोजित धर्मसभा में आचार्यश्री 108 निर्भय सागरजी महाराज ने श्रद्धालुओं को प्रेरक धर्मोपदेश दिए। उन्होंने आत्मा और संयम के महत्व को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाते हुए कहा कि आत्मा पतंग के समान है, यदि उस पर गुप्ति की पूछल्ला और संयम की डोरी रूपी मोझा लगा हो तो उसे कोई भी काट नहीं सकता।

 

 

जैन धर्म आत्मा पर आधारित है और जहां आत्मा है,वहीं जैन धर्म है। आचार्यश्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को यह स्मरण रखना चाहिए कि मैं अर्थात शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा ही हूं। जो कुछ भी आंखों से दिखाई देता है वह पुदगल है,जबकि जिस ज्ञान चक्षु से यह सब दिखाई देता है, वही आत्मा है। इसी आत्मा का चिंतन दिगंबर निग्रंथसाधु दिन-रात करते रहते हैं।

 

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हजारों आमों को पाल में रखकर पकाया जाता है, जिनमें से कुछ आम खट्टे या दागी हो जाते हैं, लेकिन इससे पूरी पाल खराब नहीं मानी जाती। उसी प्रकार यदि हजारों साधुओं में कुछ शिथिलाचारी हो जाएं तो उससे संपूर्ण साधु मार्ग दूषित नहीं होता। हमें दोष देखने के बजाय गुणों को ग्रहण करने कीभावना रखनी चाहिए।

आचार्यश्री ने कार्तिकेय स्वामी का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्तम गुणों को अपनाने में तत्पर रहना चाहिए जो साधर्मी से प्रीति व प्रेम रखने वाला होता है वह सच्चा सम्यक दृष्टि होता है। उन्होंने कहा कि हमारी आत्मा कांच के समान है, यदि उस पर वीतरागता की कलई चढ़ा दी जाए तो वह और अधिक
चमकने लगती है।

 

इस अवसर पर गुना गौरव मुनिश्री 108सुदत्त सागरजी महाराज ने कहा कि उन्हें गुना का प्रत्येक व्यक्ति राम के समान प्रतीत होता है। उन्होंने वैराग्य का संदेश देते हुए कहा कि जब हमारा शरीर और रोग भी हमारे नहीं हैं, तो धन, दौलत, बंगला, गाड़ी और प्लॉट को अपना मानने का मोह व्यर्थ है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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