पूज्य मुनि श्री सुधासागर महाराज से सुने संस्मरण को सुनकर सुनते-सुनते भीतर कहीं गुरु के प्रति आस्था और भी दृढ़, और भी निष्कलुष होती चली गई। श्रीश जैन ललितपुर
श्री श्रीश जैन ललितपुर बताते हैं की आज नववर्ष के प्रथम प्रभात में, जब मैं जगत पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री सुधासागर महाराज के श्रीमुख से प्रवाहित अमृतवाणी का श्रवण कर रहा था, तब उन्होंने अपने जीवन का एक अत्यंत पुराना, किंतु अत्यंत जीवंत संस्मरण सुनाया। वह संस्मरण केवल स्मृति नहीं था—वह समर्पण का शास्त्र था। उसे सुनते-सुनते भीतर कहीं गुरु के प्रति आस्था और भी दृढ़, और भी निष्कलुष होती चली गई।
जगत पूज्य ने बताया कि वह समय का एक ऐसा चरण था जब वे ऐलक परम् सागर जी महाराज के रूप में विराजमान थे। एक दिन उनके एक सहवर्ती ऐलक महाराज ने सहज भाव से, किंतु गहरे संकेत के साथ कहा—“महाराज, लगता है आप आचार्य महाराज से दीक्षा की बात नहीं करते, इसलिए आचार्य श्री हमें दीक्षा नहीं दे रहे। वे कहते हैं—परम् सागर जी अकेले नहीं कहते।”

यह वाक्य कोई शिकायत नहीं था, वह एक दर्पण था—और उस दर्पण में ऐलक परम् सागर जी महाराज ने स्वयं को देखा। उन्होंने बिना किसी तर्क, बिना किसी आग्रह, बिना किसी अपेक्षा के सीधे आचार्य महाराज के चरणों में पहुँचकर विनयपूर्वक निवेदन किया—“गुरुदेव, मैं आपके चरणों में आ गया हूँ। अब आपकी जो मर्जी हो।मैं आपसे कभी यह नहीं पूछूँगा कि आपने मेरे बारे में क्या सोचा, क्या निश्चय किया।”यह कहना नहीं था—यह स्वयं को मिटा देना था। और गुरु की करुणा देखिए—केवल दो महीनों के भीतर ही वही ऐलक परम् सागर जी महाराज, मुनि सुधासागर जी महाराज बन गए।




गुरु ने कुछ कहा नहीं, कुछ समझाया नहीं—बस स्वीकार कर लिया।क्योंकि जहाँ पूर्ण समर्पण होता है, वहाँ शब्दों की आवश्यकता नहीं रहती।
इसी भाव को आचार्य महाराज ने इन पंक्तियों में ढाल दिया—
> मैं नर्मदा का नरम कंकर,
आ पड़ा हूँ चरणों में तेरे।
सब कुछ समर्पित है,
अब मर्जी आपकी है।
चाहें तो मसलकर ढेर कर दें,
या तराशकर मूर्ति बना दें,
प्रतिष्ठा कर मंदिर में सजा दें।इन पंक्तियों के भाव को जब मैंने आत्मसात किया, तब मुझे लगा—यही तो मैं हूँ। मैं भी तो अपने गुरु के चरणों में पड़ा एक साधारण कंकर हूँ।अब मेरी कोई चाह नहीं, कोई अपेक्षा नहीं, कोई शर्त नहीं। मेरी पहचान, मेरी दिशा, मेरा स्वरूप—सब गुरु की मर्जी पर है।गुरु चाहें तो मुझे जैसे हूँ वैसे ही रहने दें, और चाहें तो मुझे घिसकर, तराशकर, भीतर से बदल दें।मुझे उनसे कुछ नहीं चाहिए—मुझे गुरु से नहीं, गुरु चाहिए।और यही सच्चा समर्पण है।
श्रीश ललितपुर
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

