रस ही कहा रहा रिश्तों में प्रसन्न सागर महाराज 

धर्म

रस ही कहा रहा रिश्तों में प्रसन्न सागर महाराज 

औरंगाबाद गाजियाबाद

मैं देख रहा हूं – सिंगल आदमी भी दु:खी है, रिश्ते वाले भी दु:खी है, शादी सुदा भी दु:खी है, भाई बहन भी दु:खी है, बाप बेटे भी दु:खी है, तो फिर ज़िन्दगी के मजे आखिर कौन ले रहा है-?

 

 

 अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ससंघ तरुणसागरम तीर्थ पर विराजमान हैं उनके सानिध्य में वहां विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम  हो रहें हैं उसी श्रुंखला में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि रिश्तों में कितनी भी मधुरता क्यों ना हो, यदि अनुराग और अपनत्व का भाव या अपनेपन की डोर ढ़ीली पड़ रही है तो सम्बन्धों में नीरसता आने लगती है। जीवन बोझिल लगने लगता है। फिर एक छत के नीचे रहने का कोई औचित्य भी नहीं है।

 

 

 

बस दिन कट रहे हैं और जीवन का निर्वाह हो रहा है, क्योंकि रिश्तों में आत्मीयता का अभाव जो आ गया है। ज्वाइंट फैमिली में पहले जो प्रेम, अपनापन और अनुराग का भाव दिखता था, वो आज के रिश्तों में खत्म सा हो गया है। रस ही कहाँ रहा रिश्तों में..! 

 

 

जैसे एक घरेलू जीवन में अनुराग और अपनत्व का भाव बहुत जरूरी है जिससे घर परिवार में आत्मीयता बनी रहे। सभी रिश्तों में ये जरूरी है, फिर वो घर परिवार के रिश्ते हो या संघ समाज के सम्बन्ध हो। रिश्तों की सफलताओं के लिये तीन सूत्र पर्याप्त है -सोचो मत – शुरुआत करो अनुराग से अपनत्व की।वादा मत करो – करके दिखाओ निस्वार्थ भाव से।बोलो मत – साबित करो,, प्रेम अनुराग को…

 

!!! नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *