एक आचार्य परमेष्ठी में जो गुण होना चाहिए वह सभी गुण आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज में विद्यमान थे संभवसागर महाराज 

धर्म

एक आचार्य परमेष्ठी में जो गुण होना चाहिए वह सभी गुण आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज में विद्यमान थे संभवसागर महाराज 

विदिशा 

“एक आचार्य परमेष्ठी में जो गुण होना चाहिये वह सभी गुण आचार्य गुरुदेव विद्यासागर महाराज में विद्यमान थे” उपरोक्त उदगार मुनि श्री संभवसागर महाराज ने आचार्य परमेष्ठी के गुणों का उल्लेख करते हुये व्यक्त किये।

 

उन्होंने गुरु नाम गुरु आचार्य ज्ञानसागर महाराज का उल्लेख करते हुये कहा कि वह नाना गुणों तथा अनेक भाषाओं तथा अनेक कलाओं से परिपूर्ण थे और उन्होंने अपने शिष्य आचार्य विद्यासागर को भी वह सभी गुण प्रदान किये।

 

 

 

 

 

उन्होंने अजमेर नगर की घटना का उल्लेख करते हुये कहा कि सन् 1968 में जब ब्र. विद्याधर से मुनि विद्यासागर बनाया जा रहा था उस समय उनकी उम्र मात्र 21 वर्ष छै 

महीने थी तो उस समय के अजमेर नगर के सभी श्रैष्ठी एवं विद्वान आचार्य ज्ञानसागर जी के इस फैसले से सहमत नहीं थे तथा अजमेर किशनगढ़ और नसीराबाद में यह चर्चा जोरों से शुरु हो गई एवं विरोध के स्वर निकले तथा सभी ने एक साथ मिलकर सोनी जी की नसिया में भागचंद सोनी के नेतृत्व में आचार्य ज्ञानसागर महाराज के पास पहुंचे और निवेदन किया कि ब्र.विद्याधर अभी 22 वर्ष के ही पूर्ण नहीं हुये है उनको सीधे मुनिदीक्षा न देकर पहले क्षुल्लक दीक्षा दी जाये तो उचित रहेगा। सभी श्रैष्ठियो की बातों को सुनकर आचार्य ज्ञानसागर महाराज जो कि आगम के ज्ञाता तो थे ही वह संस्कृत और प्राकृत के बहूत बड़े विद्वान थे उन्होंने संस्कृत में दयोदय महाकाव्य को लिखकर चतुष्कोणीय ग्रंथ का निर्माण किया था उन्होंने विद्याधर के विषय में कहा कि मुझे अपने शिष्य पर पूर्ण विश्वास है,और मेंने उसकी कही बार अच्छे से परीक्षा कर ली है आप लोगों को कुछ भी सोचने की कोई आवश्यकता नहीं है और वह अपने निर्णय पर अडिग रहे तथा निश्चित समय पर 30 जून 1968 को अजमेर नगर में ब्र. विद्याधर की मुनि दीक्षा संपन्न हुई।उस समय उनके गुरु आचार्य ज्ञानसागर महाराज जो कही विद्याओं से पारंगत थे उन्होंने वह सभी विद्याओं से अपने शिष्य विद्यासागर को पारगत किया तथा वह ज्योतिष शास्त्र के भी ज्ञाता थे तभी तो उन्होंने 80 वर्ष की उस उम्र में आचार्य पद लिया वह भी अपने योग्यतम शिष्य विद्यासागर के लिये ही लिया था और उन्होंने विद्यासागर को 1971 में अपना आचार्य पद प्रदान किया

जिससे वह जैन धर्म की ध्वजा के वाहक बन सके सल्लेखना समाधि के समय पर आशीर्वाद दिया कि संघ को गुरुकुल बनाना।

 

 

 और हम सभी देखते है कि हमने आपने सभी ने देखा है कि जैन जगत की वह प्रभावना जो पिछली कही शताब्दियों में नहीं हुई वह गौरवगाथा पिछले पचास वर्षों में लिखी गई। तथा यह श्रमण संस्कृति तथा जैन धर्म क चरमोत्कृष काल रहा। उपरोक्त जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने दी।

 

   संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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