सिद्धों की आराधना से जीवन में प्राप्त धर्म से जीवन में सुख , शांति और निर्मलता आती हैं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

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सिद्धों की आराधना से जीवन में प्राप्त धर्म से जीवन में सुख , शांति और निर्मलता आती हैं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

निवाई 15 दिसंबर (राजेश पंचोलिया इंदौर)

भगवान की भक्ति करने से भक्त पुण्य का संपादन करते हैं इससे जीवन में सुख ,शांति और धर्म प्राप्त होता है ।राजस्थान ही नहीं देश में सबको पता है कि आचार्य संघ जब भी राजस्थान आता है, निवाई जरूर आता है निवाई का सौभाग्य है कि यहां पर प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की परंपरा के आचार्य श्री वीरसागर जी, श्री शिवसागर जी ,श्री धर्मसागर जी ,श्री अजीतसागर जी श्री श्रुतसागर जी महाराज मुनि अवस्था में निवाई आए हैं। टोंक जिले में चातुर्मास के बाद निवाई प्रतीक्षारत था, पहले संघ के 26 साधु निवाई आए किंतु आचार्य के बिना संघ आपको अधूरा लगा। यह मंगल देशना राजकीय अतिथि पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने निवाई की धर्मसभा में प्रकट की। गुरुभक्त राजेश पंचोलिया एवं पवन बोहरा के अनुसार आचार्य श्री ने शीतकालीन प्रवास एवं आगामी दिनों में सिद्ध चक्र मंडल विधान में संघ सानिध्य प्रदान करने की स्वीकृति दी आचार्य श्री एवं पुण्यार्जक परिवार द्वारा सिद्ध चक्र महामंडल विधान की पत्रिका का विमोचन किया।आचार्य श्री ने बताया कि आठ मंदिरों और पहाड़ का निवाई नगर है सिद्धचक्र विधान में सिद्धों की आराधना होगी, सिद्ध भगवान ने भी संसारी प्राणी रहकर संसार के दुख से भयभीत होकर दीक्षा धारण कर कर्मों की निर्जरा कर परम स्वरूप सिद्ध अवस्था को प्राप्त किया। सिद्धों की आराधना से पुण्य प्राप्त होता है सिद्धों की आराधना विधान की पूजन करने से जीवन में निर्मलता आती है सभी को संघ सानिध्य में उपदेश ,भक्ति से ज्ञान प्राप्त करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। स्थानीय बड़े मंदिर में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में श्री चंद्रप्रभु भगवान और पार्श्वनाथ भगवान के जन्म और तप कल्याणक के अवसर पर मंडल विधान की पूजन पंडित निर्मल जी के निर्देशन में हुई।

 

इस अवसर पर आचार्य श्री ने बताया कि 24 तीर्थंकरों में आज चंद्रप्रभु भगवान और पार्श्वनाथ भगवान का जन्म और तप कल्याणक है जिनकेजीवन का कल्याण होता है उनके कल्याणक मनाए जाते हैं ,उनकी पूजन होती है क्योंकि भगवान बनने के बाद उनका जन्म अंतिम होता है । भगवान ने आत्मा और शरीर के भेद को जाना और समझा।विधान पूजन से जीवन में मंगल होकर पुण्य की प्राप्ति होती हैं । भगवान की आराधना,भक्ति मुक्ति का मार्ग है इससे शाश्वत सुख की प्राप्ति होती हैं दोनों भगवान के जन्म ओर तप कल्याणक पर आचार्य श्री ने संघ की शिष्या आर्यिका श्री महायशमति माताजी का जन्म दिवस पर मंगल आशीर्वाद दिया

राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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