केशलोंच दिगंबर जैन मुनियों एक मुलगुण* केशलोंच भेदविज्ञान का जीवंत उदाहरण है -आचार्य गुप्तिनंदी
पुणे
आज प्रातःकाल की मंगल बेला में *आचार्य श्री गुप्तिनन्दी जी गुरुदेव ने अपने कर कमलों से स्वयं का केशलोच किया। हमारे दिगंबर जैन मुनि हर दो ,तीन या चार महिनें के अंदर केशलोंच करते है ।
केशलोच भेदविज्ञान का प्रतीक है । साधक की सुंदरता केशलोचन करने से और बढ जाती है । केशलोच करने से आत्म शक्ति बढती है।अपना आत्मबल मजबूत होता है ।
जिनको अपने शरीर से मोह ममत्व नही है।वो ही भव्यात्मा इस मार्ग पर बढते हैं और सबसे पहले केशलोच करते हैं । संसार के लोग अपने बालों से शरीर की सुंदरता बढाते हैं। और साधु संत केशलोच करके अपनी आत्मा की सुंदरता बढाते हैं।

हर क्षेत्र में केश की आवश्यकता है ।आप बाजार में कुछ भी सामान खरीदने जाओ तो फ्री में कुछ भी नहीं मिलेगा । किसी से कुछ करवाना हो वहाँ भी केश पहले चाहिए ।अपनी बीमारी का इलाज कराना हो तो पहले डाक्टर पूछेगा केश लाये हो तो ही इलाज होगा वरना नहीं ।आज के युग में मोबाइल आदि के माध्यम से यदि किसी से बात करनी हो तो वो भी बिना केश के नहीं हो सकती । एक गिलास पानी भी पीना है तो नगद केश देकर पानी खरीदना पढे़गा तब पानी मिलेगा ।

बंधुओं कहने तात्पर्य यह है कि संसार के सब कार्य कैश देकर किये जाते हैं ,होते हैं ।उसी तरह मोक्ष मार्ग में सबसे पहले केश निकालने पढते हैं ।मोक्ष पाने के लिये केशलोचन करना होता है ।बिना केश निकाले और मुनि बने बिना किसी को ना मुक्ति हुई है और ना कभी होगी ।
हमारे दिगंबर मुनिराज कभी अपने लिये याचना नहीं करते, किसी नाई से अपने बाल नहीं बनवाते , किसी सेलून वाले के पास नही जाते, कैंची उस्तरा आदि का प्रयोग नहीं करते। गाय भैस के गोबर को सुखाने पर जो कंडे (उपले) बनते उनको जलाने पर जो राख बन जाती है।उस राख को सिर पर लगाते हैं ।जिससे पसीना से गीले बाल आसानी से हाथ में आ जाये ।बालों को निकालने के लिये कोई दवाई का प्रयोग नहीं करते हैं ।समता और सहनशीलता का परिचय देते हैं ।अपनी इच्छा से जो मोक्षमार्ग स्वीकार करते हैं ।ऐसे जैन साधु आर्यिका माताजी अपने मुलगुण का पालन करते हैं ।केशलोंच 28मुलगुणों में एक मुलगुण है।
जिस प्रकार किसान खेत में घास उखाड़ता है ।वैसे ही जैन साधु संत अपने बाल उखाडते हैंं।जब कोई जीव दीक्षा लेने के लिये आता है ।तो उसकी परीक्षा केशलोंचन से ही होती है ।दीक्षा गुरु सबसे पहले केशलोच करवाते हैं ।जो केशलोच कर लेता है ।वही महावीर भगवान के बताये हुयें मार्ग पर चल पाता है ।
उत्कृष्ट रुप मे दो माह में केशलोच करना मध्यम तीन महिने में और जघन्य चार महीने में करना । उसमें भीजिस दिन मुनि केशलोंच करते हैं ।उस दिन आचार्य ,उपाध्याय ,मुनिराज,आर्यिका माताजी को नियम से उपवास करना पढ़ता है। क्षुल्लक और क्षुल्लिका माताजी को केशलोच करने का नियम नहीं रहता है ।वो अपनी शक्ति को देखकर केशलोच भी कर सकते हैं और कैंची आदि से भी कर सकते हैं । केशलोच करने से कषायें कृष होती हैं ।अपने परिणाम निर्मल होते हैं ।शरीर के प्रति राग नहीं रहता ।अहिंसा धर्म का पालन होता हैं। आत्मा का गौरव बढता है ।आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है ।शांति का अनुभव होता है ।सिर का बोझ कम हो जाता है,।हमारे जितने भी तीर्थंकर भगवान होते हैं ।वे सब तो दीक्षा के समय पंचमुष्टि केशलोच करते हैं ।यानि पाँच बार में ही सारे बाल निकाल लेते हैं ।ऐसी शक्ति पाने के लिये हम अपनी इच्छा से केश लोंच करते है । हमारे धर्म में केशलोच करना ही संतों की पहचान है।*आज सबकी चिंताओं को हरने वाला आर्यिकाश्री आस्थाश्री माताजी द्वारा रचित चिंतामणि श्री पार्श्वनाथ विधान धूमधाम से किया गया* विधान के माध्यम से आचार्य श्री संघ ने भगवान पार्श्वनाथ के सभी तीर्थों की वंदना कराई पूरे विधान में पुणे के भक्तगण झूमते रहे।इस अवसर पर बाहर से पधारे आचार्य श्री के अनेकों परम भक्तों का स्वागत समिति के द्वारा स्वागत किया गया।
शनिवार29नवंबर को आचार्य श्री ससंघ के धर्मोदय वर्षायोग कलश का निष्ठापन, पीछी परिवर्तन एवं HND विजय का अभिनंदन समारोह सकल जैन समाज द्वारा किया जायेगा। रविवार30नवंबर को आचार्य श्री गुप्तिनंदी जी ससंघ का मंगल विहार दिन में 3:00बजे पुणे से धर्मतीर्थ क्षेत्र की ओर होगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312



