संयमीयो को असंयमीयो की बातों में नहीं आना चाहियेः- मुनि श्री संभवसागर महाराज

धर्म

संयमीयो को असंयमीयो की बातों में नहीं आना चाहियेः- मुनि श्री संभवसागर महाराज

विदिशा ः 

संत शिरोमणि आचार्य श्री 108विद्यासागरजी महामुनिराज के शिष्य एवं आचार्य समयसागर महाराज के आज्ञानुवर्ती निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108संभवसागर महाराज ससंघ स्टेशन जैन मंदिर में विराजमान है, प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने मुनिसंघ की दैनिक चर्या बताते हुये कहा प्रतिदिन 6:15 बजे आचार्य भक्ती तत्पश्चात 6:30 से विशेष कक्षा युवाओं के लिये लग रही है। तत्पश्चात 7:15 से अभिषेक एवं शांतीधारा तथा 8:30 बजे से मंचीय कार्यक्रम के अंतर्गत आचार्य श्री की संगीतमय पूजन 8:45 से मुनि श्री के प्रवचन 9:30 तक तत्पश्चात प्रवचन पर आधारित प्रश्नमंच एवं तत्काल पुरस्कार वितरण 9:45 से आहार चर्या एवं उपरांत दोपहर 12 बजे सामायिक दोपहर 3 बजे से भगवती आराधना का स्वाध्याय संध्या 5:30 बजे आचार्य भक्ती एवं 6 बजे से खजाने के मोती (मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज)की कक्षा लग रही है।

 

 

 

 

प्रातःकालीन प्रवचन सभा में निर्यापक श्रमण मुनिश्री संभवसागर महाराज ने जैन धर्म और इतिहास पर चर्चा करते हुये कहा कि जब तक हमें जैनत्व के इतिहास का वास्तविक बोध नहीं होगा तव तक हम अपनी वास्तविक जड़ों तक नहीं पहुंच सकते,उन्होंने कहा कि जैनत्व की जड़ें जितनी अधिक मजबूत होंगी उतनी ही मजबूती के साथ हम अपने धर्म के साथ खड़े रह सकते है।

 

 

 

उन्होंने आचार्य भद्रबाहु से लेकर परंपराचार्य परंपरा तथा इतिहास की विस्तृत व्याख्या की एवं

वर्तमान समय में दिगंवर जैन साधु परंपरा को जीवंत करने वाले आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज एवं आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागरजी महामुनिराज का उल्लेख करते हुये कहा कि संयमी साधुओं को कभी असंयमी श्रावकों की बातों में नहीं आना चाहिये उन्होंने संस्मरण सुनाते हुये कहा कि जब आचार्य गुरुदेव का विहार दिल्ली की ओर निश्चित था लेकिन इमरजेंसी लग जाने से वह सुहाग नगरी फिरोजाबाद में रुक गये उस समय आचार्य श्री की उम्र 25 से 27 के बीच थी एवं सभी युवा साधुओं के साथ वह लाला छिदामीलाल जैन के मंदिर में पहुंचे मेंनेजर ने मंदिर खोल दिया और सेठजी को खबर कर दी सेठ जी ने सोचा आषाढ़ का महीना है कही चातुर्मास हेतु साधु न रुक जायें इसलिये असंमजस में पड़ गये और उन्होंने आचार्य नरेन्द्र प्रकाश को यह सूचना दी और जब उनको यह जानकारी लगी कि यह कोई साधारण दि. जैन साधु नहीं बल्कि चतुर्थ कालीन चर्या के धनी आचार्य विद्यासागर जी है तो उन्होंने खुद आकर पूज्य गुरुदेव की चर्या देखी और उनसे प्रभावित होकर चातुर्मास का निवेदन किया और इस प्रकार आचार्य गुरुदेव का चातुर्मास सुहाग नगरी फिरोजाबाद में कही अतिशयकारी घटनाओं के साथ हुआ।

 

 

 मुनि श्री ने आचार्य श्री के व्यक्तित्व में दया और करुणा पर प्रकाश डालते हुये कहा घटना सन् 2000 की है जब आचार्य गुरुदेव का चातुर्मास अमरकंटक में चल रहा था और उसी समय राजस्थान में पानी नहीं गिरने से भीषण अकाल पड़ा जनमानस तो जैसे तैसे अपना पेट भर रहा था लेकिन पशुपालन बहुत दुर्लभ हो गया और जब यह खबर आचार्य गुरुदेव के पास आई तो उन्होंने सारे भारत को दया और करुणा का संदेश दिया उनके आशीर्वाद से स्पेशल ट्रेन तथा टृकों से पशु आहार मध्यप्रदेश से राजस्थान के कही शहरों में भेजा तथा एक विशेष ट्रेन में कयी अच्छी नस्लों की गायें अमरकंटक के पास पेंडरा रोड़ रेल्वे स्टेशन पर आई तो दया और करुणा के मसीहा आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महामुनिराज संघ सहित उन गायों को लेंने पेंडरा रोड़ पहुंचे और उनको अमरकंटक लेकर आये और उनके लिये गौशाला में विशेष व्यवस्था कराई।

 

 

 

 

 

अविनाश जैन विद्यावाणी से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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