पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की परम प्रभाविका शिष्या 105 आर्यिका श्री वत्सल मति जी ने 8 वे उपवास दिवस पर चारों प्रकार के आहार का त्याग कर यम संलेखना साधना प्रारंभ की।

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पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की परम प्रभाविका शिष्या 105 आर्यिका श्री वत्सल मति जी ने 8 वे उपवास दिवस पर चारों प्रकार के आहार का त्याग कर यम संलेखना साधना प्रारंभ की।आलेख राजेश पंचोलिया इंदौर प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्टपरंपरा के पंचम पट्टाधीश 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 34 साधु सहित पुरानी नसिया जिनालय में विराजित है। आचार्य श्री के सानिध्य में आगामी 7 से 12 नवंबर तक श्री पारसनाथ भगवान का पंचकल्याणक प्रतिष्ठा होगी। 5 नवंबर को प्रातः 72 वर्षीय आर्यिका श्री वत्सल मति जी ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी समक्ष 8 वे उपवास के दिवस यम संलेखना ग्रहण कर चारों आहार का त्याग कर दिया।गुरु भक्त राजेश पंचोलिया ने पूज्य आर्यिका श्री वत्सल मति जी के परिचय में बताया कि

आर्यिका श्री वत्सलमति माताजी का जन्म कार्तिक वदी ग्यारस सन 1953 को सलूंबर राजस्थान के श्रीमती सज्जन देवी श्री मोतीलाल जी के यहां रत्नत्रय के प्रतीक तीसरी संतान में हुआ। 6 भाई बहनों में आप से बड़ी बहन श्रीमती चंदा भाई श्री बदामीलाल जी के बाद आपका जन्म हुआ ।आपका नाम विमला जी रखा गया। आपके बाद क्रमशः श्री यशवन्त,श्री भूपेंद्र ओर श्रीमती हेमलता का जन्म हुआ।आपका विवाह श्री फतेहलाल जी से हुआ। आपने आचार्य श्री धर्म सागर जी से 2 व्रत प्रतिमा के व्रत प्रतिमा के नियम लेकर संघ में शामिल हो गई। 7 व्रत प्रतिमा के नियम आचार्य श्री वर्धमान सागर से लिए।आपकी आर्यिका दीक्षा 15 फरवरी 1997 पंच कल्याणक में भिंडर में हुईं। उस दिन आपके सहित 4 आर्यिका दीक्षाएं हुई।आचार्य श्री द्वारा दीक्षित 118 शिष्यों में एक मात्र पहली शिष्या हैं जिनकी पूर्व नाम श्री विमला ओर दीक्षा नाम आर्यिका वत्सल मति ओर गुरु नाम श्री वर्धमान सागर जी व शब्द का त्रिवेणी रत्नत्रय अद्भुत अनूठा संयोग है।आचार्य श्री का गृहस्थ अवस्था का नाम श्री यशवंत रहा, आर्यिका श्री वत्सल मति जी के गृहस्थ अवस्था के भाई का नाम भी श्री यशवंत हैं। आपका आत्मबल इतना मजबूत है कि शारीरिक कमजोरी भी हार मान जाती हैं।आपने अन्न आहार का त्याग काफी माह पूर्व करके अब संपूर्ण 6 रसों का त्याग कर दियाअष्टांहिका जैसे पावन पर्व पर 8 उपवास की साधना करते हुए 72 वर्ष की उम्र ,28 वर्ष के संयमी जीवन में 5 नवंबर 2025 को 1008 श्री जी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी एवं समस्त संघ समक्ष चारों प्रकार के आहार का त्याग कर दिया । आपने अभी तक हजारों उपवास किए।चार बार श्री बाहुबली भगवान का महामस्तकाभिषेक गृहस्थ अवस्था में वर्ष 1981 ,ओर ब्रह्मचारिणी अवस्था में वर्ष 1993 का दो बार तथा साधु जीवन में वर्ष 2006 ओर वर्ष 2018 में दर्शन लाभ किया। आपको अभी तक 100 से अधिक दीक्षा और समाधियां देखने का अवसर मिला।3 नवंबर को आपने उपवास के दौरान हृदयस्पर्शी प्रवचन दिया।

आज आचार्य श्री के संघ सानिध्य में श्री जी का भव्य पंचामृत अभिषेक हुआ।

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