गणाचार्य समाधि सम्राट आचार्य विराग सागर जी महाराज का 33 वा आचार्य पदारोहण दिवस मनाया गया।

धर्म

गणाचार्य समाधि सम्राट आचार्य विराग सागर जी महाराज का 33 वा आचार्य पदारोहण दिवस मनाया गया।

सनावद – तप साधना एवं त्याग के लिए जाने वाले नगर  सनावद में गणाचार्य विराग सागर जी महाराज का 33 वा आचार्य पदारोहण दिवस मनाया गया।

 

 

सन्मति जैन काका ने बताया कि नगर में पद विहार के पधारे उपाध्याय मुनि श्री विश्रुत सागर जी महाराज संसंघ एवं नगर में चातुर्मास रत मुनि श्री विश्वसुर्य सागर जी महाराज एवं मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज के पावन सानिध्य में गणाचार्य समाधि सम्राट विराग सागर जी महाराज का 33 वा आचार्य पदारोहण दिवसआज कार्तिक सुदी तेरस को बड़े भक्ति भाव एवं हर्षोल्लास से मनाया गया मनाया गया।

जिसमें अंतर्गत श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर एवं आचार्य शांति सागर वर्धमान देशना संत निलय में श्री जी का पंचामृत अभिषेक किया गया जिसमें पूर्ण सुगंधित कलश करने का सौभाग्य सुधीर कुमार प्रशांत कुमार चौधरी परिवार को प्राप्त हुआ एवं शांति धारा करने करने का सौभाग्य श्रीकांत जटाले परिवार को प्राप्त हुआ।

इस क्रम में उपाध्याय श्री विश्रुत सागर जी महाराज एवं युगल मुनिराज के सानिध्य में आचार्य छत्तीसी विधान रचाया गया जिसमें उपाध्याय मुनि श्री के द्वारा प्रत्येक अर्घ्य का विशेष महत्व बताते हुवे कुल 36 अर्घ्य समर्पित किए गए। इसी कड़ी में उपाध्याय मुनि श्री विश्रुत सागर जी महाराज के पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेट करने का सौभाग्य खुशकवर बाई सुरेश चंद पांड्या अमर ज्योति बस परिवार को प्राप्त हुआ एवं मुनि श्री निर्वेद सागर जी महाराज को शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य विपिन कुमार संजय कुमार बदूद परिवार को एवं मुनि श्री साध्य सागर महाराज को शास्त्र भेंट कर ने का सौभाग्य विशाल वैभव सराफ परिवार को एवं मुनि श्री विश्वसुर्य सागर जी महाराज को शास्त्र भेंट कर ने का सौभाग्य विशाल कुमार बारिश कुमार बदूद परिवार को प्राप्त हुआ। इस अवसर पर विराजमान मुनि श्री निर्वेद सागर जी महाराज मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज एवं मुनि श्री विश्वसुर्य सागर जी महाराज ने आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के प्रति अपनी विनयांजलि समर्पित की। इसी क्रम में उपाध्याय मुनि श्री अपने गुरु के प्रति विनयांजलि समर्पित करते हुवे कहा की सभी मुनिराजो के साथ आनंद के साथ वात्सल्य के साथ रहना सिखाया है।ओर इस युग प्रतिक्रमण करवाने वाले आचार्य परमेष्टि थे तो वो आचार्य विराग सागर जी महाराज थे। जिन्होंने प्राचीन परम्पराओं  का उद्ववहन पुनः किया है जिससे संघ इकट्ठा होता था। एक बात ध्यान रखना जो काम धन भी नहीं करता वो काम आचार्य श्री ने के दिखाया आप ने छोटे से छोटे ओर बड़े से बड़े दीक्षा लेने वाले उपकारियों पर उपकार किया। वो वास्तविकता में वो बुजूर्गो के देवता कहलाते थे। आप ने अंत में समाधि मरण कैसे किया जाता है , आचार्य पद कैसे छोड़ा जाता है, संघ व्यवस्थित कैसे किया जाता है, अगर किसी से सीखना हो तो ये आचार्य विराग सागर जी महाराज ने कर दिखाया। आचार्य भगवन के गुण भी अनंत है आप के उपकार भी अनंत है । इस अवसर पर प्रशांत चौधरी कमल केके ब्रह्मचारी पारस भईया अर्पित भईया के द्वारा सुमधुर भजन एवं भक्ति कर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

इस अवसर पर सभी समाजजन उपस्थित थे।

 

*आज इस मंगल बेला में उपाध्याय श्री विश्रुत सागर जी महाराज ने प्रातः काल  की मंगल बेला में अपने केशलोच किए।*

सन्मति जैन ने बताया की दिगंबर साधु समस्त परिग्रह से रहित होते है तथा अपने पास केवल एक मयूर पंख से बनी पीछी रखते है अतः बालों को हटाने के लिए वे उस्तरा आदि अपने पास नर्ही रख सकते व ना ही इनका प्रयोग कर सकते और चूंकि साधु स्वावलंबी होते है और उनकी चर्या सिंह के समान होती है इस लिए बाल हटाने के लिए किसी का सहारा भी नही लेते। इस लिए वे अपने हाथों से बालों को नोंच कर उखाड़ते है। इस क्रिया को केश लोंच कहते है। वैसे केशलोंच परिषह सहन करने के लिए भी जरूरी होता है। दिगम्बर मुनि महाव्रती होते है और 22 परिषह को सहज ही सहन करते है तथा 28 मूल गुणों का पालन करते है जिसमे हाथों से केशलोंच करना एक आवश्यक क्रिया है। और चूंकि केशलोंच करने से भी अनेक परजीवी छोटे जीवों की विराधना होती है जिसके प्राश्चियत स्वरूप मुनि उस दिन निराहार रह कर उपवास भी रखते हैं। अतः दिगम्बर मुनि अहिंसा की जीवंत छवि होते है जिनसे किसी भी जीव को किसी तरह का कोई भय नही रहता है। मुनि स्वयंम भी अभय होते है और दूसरों को भी अभय ही प्रदान करते है।

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