दसलक्षण महापर्व में भावों की विशुद्धि हो न कि कषायों का बन्ध संजय जैन बड़जात्या कामां

धर्म

दसलक्षण महापर्व में भावों की विशुद्धि हो न कि कषायों का बन्ध संजय जैन बड़जात्या कामां
टाइटल पढ़कर आप चौंक गए होंगे लेकिन वास्तविक रूप से यह सत्य है आइए कुछ चर्चा करते हैं। क्षमा से प्रारंभ होकर क्षमापना पर समाप्त होने वाले महापर्व दस लक्षण की अग्रिम शुभकामनाएं/बधाई।

 

 

वैसे तो यह पर्व मन के विकारों की विशुद्धि के लिए आते हैं और हमें इन पर्वों का सदुपयोग भी करना चाहिए। मंदिरों में बड़े-बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के साथ साथ प्रतियोगिताये भी इन दिनों में सबसे अधिक होती हैं और यहीं से एक दूसरे के प्रति वैमनस्यता की भावना उत्पन्न होने लगती है। जो कि इन महापर्वों के बिल्कुल विपरीत है।

 

सबसे ज्यादा इन दस दिनों में ही हमें स्वयं को प्रदर्शित करने का मौका मिलता है। और यूं कहे की एक दूसरे के प्रति कषाय बांधने का यदि कोई समय मिलता है तो वह इन दस दिनों में ही पूर्ण होता है।

आप सभी यह सोचेंगे कि यह तो बिल्कुल विपरीत बात हुई, हां वास्तविक रूप से ऐसा विपरीत ही हम सब करते हैं और करते आ रहे हैं। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। आत्मा की विशुद्धि के साथ-साथ स्वयं को बिल्कुल सरल बनाते हुए क्षमा का भाव रखकर जीवन यापन करने का संदेश देना ही दस लक्षण महापर्व की सार्थकता है। यही सार्थकता इन दस दिनों में बनी रहे इसका ही हमें सदप्रयास करना चाहिए।
क्षमा के साथ सादर जय जिनेंद्र

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