कुछ लोगों के जन्म स्मरण करने योग्य होते हैं आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज

धर्म

कुछ लोगों के जन्म स्मरण करने योग्य होते हैं आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज
रामगंजमंडी
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज, आचार्य श्री 108 सुनीलसागर महाराज, आचार्य श्री 108 समयसागर महाराज एवम गणिनी आर्यिका 105ज्ञानमति माताजी के जन्म दिवस के अवसर पर कहा कि आज आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का एवं आर्यिका ज्ञानमति माताजी का जन्म दिन है साथ ही आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज का जन्मदिन है। कुछ लोगों के जो जन्मदिन होते हैं वह स्मरण करने योग्य होते हैं। क्योंकि इन्होंने भोगों का त्याग किया, राग द्वेष का त्याग किया और संयम के मार्ग को स्वीकार किया संयम के मार्ग को स्वीकार कर लिया तो वह है तब भी स्मरण करने के योग्य है नहीं है तो भी स्मरण करने योग्य है।

आचार्य श्री विद्यासागर महाराज हमारे बीच में नहीं है यह नियति है, कोई इसे बदल नहीं सकता। उनके जीवन के गुण उनके जीवन के कार्य उनकी विशेषता और उनके कार्य अनुकरणीय भी है और स्मरण करने के योग्य भी है।

 

वर्तमान में ज्ञानमति माताजी है अभी वयोवृद्ध है 95 साल से ऊपर है फिर भी वो जैन दर्शन के लिए कितना काम करती हैं। जैन दर्शन के लिए कितना काम किया है स्त्री पर्याय में होने पर भी उन्होंने जिनवाणी की बहुत-बहुत सेवा की है। हम यह भावना करे कि यह जीव शीघ्र सिद्धालय पहुंचे ।

अगर हम बिना नियम व्रत के जीवन जीते है तो हमारा जीवन दुर्गति की ओर जाता है।
आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में व्रतों के विषय में बताया उन्होंने कहा व्रत का अर्थ होता है नियम में बंधना उन्होंने कहा दो ही रास्ते हैं या तो हम नियम में बंधे या बिना नियम के चले यदि हम बिना नियम व्रत के जीवन जीते हैं तो हमारा जीवन दुर्गति की ओर जाता है। शरीर का श्रृंगार सभी करते हैं लेकिन आत्मा का श्रृंगार व्रती करता है। व्रतों को धारण करने का मतलब होता है आत्मा का श्रृंगार करना जैन दर्शन कहता है शरीर का श्रृंगार छूट जाए लेकिन आत्मा का श्रृंगार नहीं छूटना चाहिए। शरीर का श्रृंगार नहीं करना है आत्मा का श्रृंगार करना है व्रत आत्मा को श्रृंगार करने वाले हैं और व्रत आत्मा को व्यवस्थित करने वाले हैं।

जो तुम चाह रहे हो उसका रास्ता आधुनिकता नहीं है त्याग है
आचार्य श्री ने कहा कि हम आधुनिकता में बहुत कुछ पीछे छोड़ते जा रहे हैं हम कहते तो हैं की समाधि मरण हो जाए लेकिन हम आधुनिकता के कारण हम उसे पीछे छोड़ते जा रहे हैं। जो तुम चाह रहे हो उसका रास्ता आधुनिकता नहीं है उसका रास्ता त्याग है। हमारी लगन शब्दों में है वास्तविकता में नहीं है। और अगर वास्तविकता में आता है तो हमें लगता है कि आधुनिकता से पीछे हटते जाए

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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