” उन्मुक्त योनाचार की वकालत ने व्याभिचार को बढ़ावा दिया” प्रमाण सागर महाराज
भोपाल (अवधपुरी) प्रवक्ता
अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया रविवार को प्रातःप्रवचन सभा में भोपाल ही नहीं बल्कि बाहर से पधारे हुये धर्म श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित थे। । धर्मसभा में मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने वास्तविक धर्माचरण की बात करते हुये कहा कि भारतीय इतिहास और परंपरा में “पत्नी के अलावा अन्य स्त्री को मां बहन तथा पर पुरुष को पिता और भाई के रुप में देखे जाने की परंपरा रही है,वर्तमान समय में पुरुषों तथा स्त्रियों दोनों में जिस तरीकों से”लम्पटता” बड़ी है,उसने भटकाव को जन्म दिया है,आजकल जिस प्रकार से उन्मुक्त योनाचार की खुली वकालत हो रही है उसने खुले रुप से “व्याभिचार” को बढ़ावा दिया है,वह चिंतनीय है।
उन्होंने कहा कि उन्मुक्त योनाचार की खुली वकालत हमारी सारी मर्यादाओं को तार तार कर रही है,जो हमारी चेतना के पतन का कारण है,जिसका भयावह तथा घिनोना स्वरूप भी सामने आ रहा है मुनि श्री ने कहा कि महिला हो या पुरुष दोनो ओर से दृष्टि की मर्यादाओं को सुरक्षित रखनाअनिवार्य है,तभी हम अपने आपको सुरक्षित रख पाऐंगे। उन्होंने “परचिंता, परनिंदा,परनारी,और परधन, पर हमारे धर्मशास्त्र कहते है, जो व्यक्ती इन चारों में मग्न रहता है,उसका अधोपतन निश्चित है, “परचिंता” को धमःधमःकहते हुये कहा कि चिंता तो किसी को किसी की करना ही नहीं चाहिये,चिंता करने वाला स्वभाव से रूग्ण व बैचैन हो जाता है,उसके अंतस में कभी भावनात्मक स्थिरता रह ही नहीं पाती,अपने घर परिवार मित्रों कुटुंबियों की चिंता करो तो फिर भी ठीक है,संसार भर की फिजूल की चिंताओं में अपने आपको समाहित रखना क्या उचित है? उन्होंने कहा अपने कर्तव्यों का पालन करो उनका संरक्षण करो लेकिन उनकी चिंता को अपने ऊपर हांवी न होंने दें, चिंता नहीं बल्कि स्व आत्मा का चिंतन करो कि “में कौन हुं”? 


मुनि श्री ने कहा कि दूसरों की निंदा करने वाला महापाप का भागीदार बनता है, जो दूसरों की निंदा और आलोचना करता है,उसका खुद का जीवन निंदनीय हो जाता है, दूसरों के गुणों की प्रशंसा और अपने अवगुणों की गरहा करने वाले व्यक्ति का जीवन ही उठ पाता है, मुनि श्री ने कहा कि आप हालांकि प्रतिदिन पूजन के आखरी में यह लाईन पड़ते है कि “दोष ढांकू सभी का” “दोष वादे च मौनं” कितने लोग है जो किसी के दोष का प्रसंग आने पर मौन धारण करते है? आजकल तो सोशल मीडिया आपके पास है,यदि आपके मन में किसी के प्रति द्वैष है,उसकी कमजोरी सामने आ जाये तोपूरी ताकत के साथ उसको नीचा दिखाने की भावना प्रकट हो जाती है इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है,”दूसरों से ईर्ष्या और आपको सर्व श्रैष्ठ मानना”


मुनि श्री ने कहा कि आप जान बुझकर कोई अपराध नहीं करते प्रतिदिन सोने से पूर्व और सुबह सुबह उठकर भावनायोग कीजिये एवं अपने स्मृतिपटल पर अपने कृत्यों की आलोचना और गरहा कीजिये निश्चित कर आप इन दोषों से बच जायेंगे।
मुनि श्री ने कहा कि अपनी बुराइयों को लिखो और गुणग्रहण का भाव रखोगे तो निश्चित करके आपके अंदर से एक बदलाव आऐगा और भटकाव रूकेगा, मुनि श्री ने कहा कि आप सभी लोग धर्म की क्रियाओं को करते हें उससे जो पुण्य एकत्रित किया,वह जरा सी नादानी या भूल में आपके किये कराये पर पानी फेर देता है” *

परधन* पर व्याख्या करते हुये मुनि श्री ने कहा कि दूसरों का एक थैला लेना भी नमकहरामी है,और आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं जो दूसरों की वस्तु पर अपना अधिकार नहीं समझते एक आंटो रिक्शा वाले की घटना का जिक्र करते हुये कहा कि एक महिला की चार तौला की चेन रिक्शा में पैसा देते समय पर्स से निकल गयी जब उस आंटो वाले की निगाह पड़ी तो वह उस महिला का घर ढूंढते हुये पहुंचा और उसकी चैन
वापिस लौटाई तब उसको चैन आया उसको जब पारितोषिक देना चाहा तो उसने लेने से इंकार कर दिया और कहा कि यह तो मेरा कर्तव्य था मुनि श्री ने कहा कि ऐसी उत्कृष्ट भावना बहुत कम लोगों में पाई जाती है,ऐसा उन लोगों के जीवन में घटता है,जो जीवन और जीवन के मूल्य को पहचानते है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
