हवन पूर्णाहुति के साथ सिद्ध चक्र महामंडल विधान का हुआ समापन हवन का मतलब समीक्षा करना यह देख पाना कि मेने क्या किया आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज
रामगंजमंडी
विगत दिनों से चल रहे सिद्ध चक्र महामंडल विधान का समापन रविवार की बेला में श्री जी का अभिषेक शांति धारा के उपरांत नित्य नियम पूजन हवन पूर्णाहुति के साथ संपन्न हो गया।
इस क्रम में भक्तों को गुरुदेव आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज का आशीर्वचन भी प्राप्त हुआ गुरुदेव ने हवन का अर्थ समझाया उन्होंने कहा कि हवन का मतलब समीक्षा करना होता है यह देख पाना मैने क्या पाया है। उन्होंने कहा हवन करने उद्देश्य तो शांति का होता है। लेकिन वह भी विश्व शांति का। हवन करके हम समीक्षा करते हैं कि हमने क्या किया।

अरघ चढ़ाना महत्वपूर्ण नहीं है भाव महत्वपूर्ण है
उन्होंने कहा आपने विधान में अरघ चढ़ाया यह महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण यह है कि इसमें कितने भाव हमारे थे। केवल जैन दर्शन है जो संपूर्ण सत्य कथन करता है। क्रिया बिना भाव के भी हो सकती है क्रिया अलग है और भाव अलग है। पूजा और धर्मध्यानमें दोनों का मिलाना होता है। जब हम द्रव्य समर्पित करे तो क्रिया और भाव एक हो। यह कठिन जरूर है लेकिन मेहनत परिश्रम किया जाए तो यह मिल सकता है। 

धर्म के लिए एकाग्रता चाहिए क्रिया निराकुल भाव से करना चाहिए
आचार्य श्री ने धर्म करने के लिए एकाग्रता पर जोर दिया और उन्होंने कहा कि धार्मिक क्रिया बिल्कुल निराकुल भाव से करना चाहिए। आकुलता के साथ क्रिया से भाव नहीं मिल सकता। दुनिया की ओर बोलते हुए गुरुदेव ने कहा कि दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है कि काम कम होना चाहिए लेकिन समय ज्यादा होना चाहिए। एक घंटे आप पुजा करते हो भाव क्रिया के साथ लाखों ऊर्जा का फल पा सकते हो। लोग डरते है डरो मत पुरुषार्थ करोगे अपना काम सीखोगे जीना तो अपने आप सीखोगे और अपना काम सीखोगे और भाव लगाना भी सीखोगे। 

पूजा और भाव को एक करने का प्रयास करना चाहिए
आचार्य श्री ने कहा कि पूजा में द्रव्य और भाव को एक करने का प्रयास होना चाहिए पूजा में द्रव्य के साथ भाव भी हो। जब हम द्रव्य चढ़ा रहे हो साथ में हमारा भाव भी हो। जो लोग वर्षों से पूजन कर रहे हैं उनसे ट्रेनिंग भी लेना चाहिए। उन्होंने कहा कोई भी कार्य सरल है कोई भी कार्य कठिन है यदि हमें करना आता है तो वह हमें सरल लगता है और यदि वह हमें नहीं आता है तो कठिन है कोई भी कार्य को कठिन और सरल हम ही बनाते हैं। यदि हम भगवान का नाम बड़े भाव से ले लेते हैं तो कर्मों की निर्जरा होती है इस प्रकार जब हम अनुष्ठान करते हैं इसलिए करते हैं कौन सा कार्य कैसे करना है उसे हम अच्छे से करना सीख लें। 
कोई किसी का कर्ता नहीं है कर्म के सिद्धांत में कोई भगवान आडे नहीं आएंगे
आचार्य श्री ने कहा कोई किसी का कर्ता नहीं है न हमारा कोई कर्ता है न तुम्हारा कोई कर्ता है कर्म सिद्धांत ही होते हैं कर्म के सिद्धांत में कोई भगवान आड़े नहीं आएंगे, जो किया है तुम्हें ही भोगना है तुमने बिगाड़ा है तुम्हें ही ठीक करना होगा।
हवन रोज होना चाहिए
आचार्य श्री ने कहा हवन तो रोज होना चाहिए मंदिर में मंदिर में जो हवन कुंड है उसमें रोज एक बुराई कागज में लिखो हवन कुंड में डालना चाहिए मंदिर में आकर राग द्वेष छूटना चाहिए और धर्म अनुराग होना चाहिए। बिना आकुलता बिना निराकुलता के भाव के साथ विधान करना चाहिए।
मोबाइल ने आकुलता बढाई है
आचार्य श्री ने मोबाइल की उपयोग पर भी कड़ी चिंता जताई उन्होंने कहा कि जब से मोबाइल आया है इसने केवल आकुलता ही बढाई हैं लोगों का बोलना उठना एक साथ बैठना भी बदल गया है।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312



