खंडेनवमी पर तुळजापुर में होने वाली अजबली प्रथा बंद होनी चाहिए”डॉ. कल्याण गंगवाल की मांग

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खंडेनवमी पर तुळजापुर में होने वाली अजबली प्रथा बंद होनी चाहिए”डॉ. कल्याण गंगवाल की मांग; अजबली प्रथा अमानवीय, धर्मविरोधी और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने का दावा

पुणे:

नवरात्रोत्सव में खंडेनवमी के दिन श्री तुळजाभवानी माता के मंदिर में अजबली देने की प्रथा तुरंत बंद की जानी चाहिए, ऐसी मांग सर्वजीव मंगल प्रतिष्ठान के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. कल्याण गंगवाल ने की। अजबली की यह प्रथा अनिष्टकारी, अमानवीय, धर्मविरोधी और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, ऐसा दावा भी डॉ. गंगवाल ने किया।

 

इस संबंध में डॉ. गंगवाल ने राज्य के मुख्यमंत्री, दोनों उपमुख्यमंत्री, गृहमंत्री, मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, पुलिस महासंचालक, धाराशिव के पालकमंत्री, जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, तुळजापुर के उपविभागीय अधिकारी, पुलिस निरीक्षक आदि को पत्र भेजा है।

डॉ. गंगवाल ने कहा, “हर वर्ष की तरह इस बार भी नवरात्र महोत्सव धार्मिक श्रद्धा के साथ बड़े पैमाने पर मनाया जा रहा है। खंडेनवमी के दिन श्री तुळजाभवानी माता के मंदिर में अजबली देने की परंपरा चली आ रही है। यह प्रथा मानवीय सभ्यता और कानून के विरोध में है। खंडेनवमी के दिन असुर को नैवेद्य के रूप में बकरे की बलि देने की परंपरा है। लेकिन इस प्रथा का कोई धार्मिक आधार नहीं है। अंधविश्वास से वर्षों से चली आ रही इस अमानवीय प्रथा के अनुसार, हजारों श्रद्धालु अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक या मानसिक मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए देवी के सामने हजारों बकरों की बलि देते हैं और उसका मांस ‘प्रसाद’ के रूप में ग्रहण करते हैं।”

 

“इस अवधि में हजारों बकरों की बलि दी जाती है, साथ ही इससे बीमारियों और अस्वस्थता को भी आमंत्रण मिलता है। भले ही देवस्थान की आय में इसकी वजह से बढ़ोतरी होती हो, लेकिन अंततः यह अजबली प्रथा सुसंस्कृत, विज्ञानवादी मानव धर्म के विरोध में ही है। इसके अलावा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अनुसार खुले में पशु हत्या करना अवैध है। मुंबई पुलिस अधिनियम की धारा 105 और भारतीय दंड संहिता की धारा 133 भी सार्वजनिक स्थल पर की जाने वाली पशु हत्या को गैरकानूनी ठहराते हैं और लोगों की भावनाओं को आहत करने वाला अपराध मानते हैं,” ऐसा डॉ. गंगवाल ने कहा।

उन्होंने आगे कहा कि, “इस विषय में मुंबई उच्च न्यायालय में कृषी गोसेवा संघ (मालेगांव) ने याचिका दाखिल की थी। न्यायालय ने शासन को पशु बलि के संबंध में स्पष्ट भूमिका रखने का निर्देश दिया था। उस समय राज्य शासन ने उच्च न्यायालय में आदेश (रिट पेटिशन 5175/96) दाखिल किए थे। मुंबई हाईकोर्ट और औरंगाबाद खंडपीठ में भी ऐसे धार्मिक मेलों में देवताओं के नाम पर बलि देने की प्रथा के खिलाफ अलग-अलग रिट याचिकाएँ दाखिल हुई थीं। औरंगाबाद खंडपीठ ने 23-7-1998 के आदेशानुसार देवताओं के नाम पर होने वाली पशु-पक्षियों की बलि बंद करने का निर्देश दिया था, जिसे राज्य शासन ने भी स्वीकार किया था। राज्य सरकार के गृह विभाग द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट लिखा था कि राज्य के किसी भी गाँव में मेलों-जत्राओं में होने वाली पशु बलि बंद करने का आदेश सभी जिला पुलिस प्रमुखों को दिया जा रहा है और इस काम में लगे स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं को पूरा सहयोग देना चाहिए ताकि पशु बलि रोकी जा सके।”

“कानून और प्रबोधन के माध्यम से यह अमानवीय, अंधविश्वास से पोषित प्रथा कम होती जा रही है। चिवरी और नगर जिले के पुणेकरवाड़ी गाँव की जत्राओं में पशु हत्या में उल्लेखनीय कमी आई है। पाँच वर्ष पूर्व तत्कालीन जिलाधिकारी ने अजबली में शामिल होने से इनकार कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हरियाणा और त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने भी हाल ही में देवी-देवताओं के सामने पशु/पक्षी बलि पर प्रतिबंध लगाया है। गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में कई वर्षों से कानूनन बलि देना प्रतिबंधित है। महाराष्ट्र में भी कानून बनाकर इस प्रथा को बंद करने के लिए सर्वजीव मंगल प्रतिष्ठान की ओर से पिछले 30 वर्षों से समय-समय पर अनुरोध किया जाता रहा है।”
– डॉ. कल्याण गंगवाल, संस्थापक अध्यक्ष, सर्वजीव मंगल प्रतिष्ठान

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