असीम सुख तुम्हारी आत्मा में है आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज 

धर्म

असीम सुख तुम्हारी आत्मा में है आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज 

रामगंजमंडी 

  आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में हो रहे सिद्धचक्र महामंडल विधान में 512 अरघ समर्पित किए गए आचार्य श्री ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि इस संसार में प्रत्येक जीव को कुछ न कुछ तो चाहिए प्रत्येक जीव सुख चाहता है। व्यक्ति मेहनत परिश्रम व्यापार धन अर्जन इसलिए कर रहा है मुझे सुख मिलेगा। प्रत्येक व्यक्ति को लगता है कि जितना ज़्यादा धन अर्जन होगा फायदा होगा उतना मुझे सुख मिलेगा। ऐसा सबको लगता है। लेकिन ऐसा होता नहीं है।

 

यदि किसी धनवान व्यक्ति पूछा जाता है तो वह कहता है सुख तो है ही नहीं और निर्धन भी कहता है सुख नहीं है, उन्होंने कहा ऐसी भ्रांति बनी हुई है कि यदि संपत्ति अधिक होगी तो अधिक सुख और संपत्ति कम होगी तो कम सुख सुख पैसे से नहीं मिलता ऐसा होता तो पैसे वाले स्टॉक कर लेते और गोदाम भर देते। क्योंकि पैसे वाले भी मारे मारे फिर रहे हैं सुख के लिए पैसे वाले भी दृष्टि लगाए हुए हैं प्रति समय इच्छा कर रहे हैं कि मुझे सुकून मिल जाए। सुख ऐसी चीज हैं जितना इसके पास जाओ दूर चली जाती है। सुख पकड़ में नहीं आता।

 

        संत बहुत विचित्र होते हैं 

आचार्य श्री ने कहा संतो को समझना बहुत मुश्किल होता है कभी समझने की कोशिश भी मत करना संत बहुत विचित्र होते हैं वह समझने में नहीं आयेगे जब वो बोलेंगे नहीं तो समझो बहुत बोल रहे हैं और जब बोल रहे हैं तो समझो कुछ नहीं बोल रहे है। विचित्रता है नहीं बोलकर भी वह बहुत कुछ काम करा लेते हैं, दिगंबर संतो की बात बहुत निराली है उन्हें समझना बहुत टेडी खीर है

 

आचार्य श्री ने कहा असीम सुख तुम्हारी आत्मा में है अंतस चेतना में सुख ही सुख है दुख तो है ही नहीं है एक बार वहां तक पहुंच जाओ सुख को हासिल कर लो। 

यहा वहां से हम अपेक्षा करेंगे मांगेंगे तो केवल इंद्रिय सुख मिल जाएगा आत्मा की फोटो नहीं उतरती और शरीर की फोटो उतरती है शरीर को लोग जलाकर राख कर देते हैं अगर आपने धर्म ध्यान के संग्रह के साथ पुण्य किया है तो अगले भवो के साथ इंद्रिय सुख के साथ अध्यात्म सुख देने वाला भी सिद्ध हो जाएगा।

 

  थोड़ी सी लापरवाही बहुत नुकसान कर देती है। 

आचार्य श्री ने लापरवाही के विषय में कहा कि बड़े-बड़े नुकसान लापरवाही से होते हैं। थोड़ी सी लापरवाही के कारण होता है जो 

नासमझी के कारण होता है। बड़े से बड़े नुकसान लापरवाही के कारण होते हैं। रावण थोड़ी सी लापरवाही के कारण नरक पहुंच गया। महाभारत हो गया थोड़ी सी नासमझी लापरवाही के कारण हमारे जीवन में ऐसी लापरवाही नासमझी होती है जो हमें दुखो का सामना करने के लिए खड़ा कर देती है सुख आत्मा में ही मिलेगा लक्ष्य को पाने के लिए परिश्रम करना पड़ता है इसका मतलब है कि संपूर्ण योग और उपयोग लगाना होता है और यदि हम धर्म ध्यान में योग उपयोग लगाएंगे तो बहुत कुछ मिलेगा।

 

  जल बहुत उपयोगी है

आचार्य श्री में जल को उपयोगी बताते हुए कहा कि जल बहुत उपयोगी है ऐसा कोई काम नहीं है जो जल के बिना ना हो जीवन की अनिवार्यता जल है। जल के बिना काम नहीं चल सकता इस पृथ्वी पर भी सबसे ज्यादा जल है। हम पूजन के द्रव्य में सबसे उपयोगी वस्तु समर्पित कर रहे हैं। हमें सबसे कीमती वस्तु चाहिए जन्म जरा मृत्यु की समाप्ति हो इस हेतु जल समर्पित कर रहे हैं।

 

आप इसीलिए दुखी है कि आपकी मन वचन काया शुद्ध नहीं है 

आचार्य श्री ने दुखी होने का कारण बताते हुए कहा कि आप दुखी इसलिए हैं कि आपकी मन वचन काया शुद्ध नहीं है, और आपकी क्रिया शुद्ध नहीं है आप दुखी इसलिए नहीं हैं धन पैसा मकान नही इसलिए दुखी हैं कि आपकी मन वचन काया शुद्ध नहीं है। ठीक नहीं है जब यह ठीक होगी तो तभी जाकर आप सुखी हो सकते हो। 

      अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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