श्री जी के दर्शन ,अभिषेक ,पूजन स्वाध्याय विनय पूर्वक करना चाहिए विनय मोक्ष का द्वार है आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

धर्म

श्री जी के दर्शन ,अभिषेक ,पूजन स्वाध्याय विनय पूर्वक करना चाहिए विनय मोक्ष का द्वार है आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

टोंक भगवान की जय जयकार आप करते हैं जय जयकार भगवान के गुणों की जाती है। जयकार करने का उद्देश्य यही होता है कि हम भी भगवान , आचार्य साधु परमेष्ठि के गुणों को प्राप्त करें। जिस प्रकार अंधेरे को प्रकाश दूर करता है इसी प्रकार अज्ञान रूपी अंधकार जिनवाणी श्रुत से दूर होता है। कोई भी धार्मिक कार्य चाहे दर्शन हो ,पूजन हो ,अभिषेक हो ,स्वाध्याय हो,आहार देना हो आप को बिना आकुलता के विधि पूर्वक विनय पूर्वक करना चाहिए। संसारी प्राणी धार्मिक कार्यों में जल्दबाजी करता है जबकि व्यापार करना हो तो पूरी एकाग्रता रहती है धैर्य रखते हो , ग्राहक का भी आप विनय करते हो किंतु मंदिर आने पर भगवान की, आचार्य ,साधु परमेष्ठी, जिनवाणी कि आप विनय नहीं करते हैं जबकि विनय मोक्ष का द्वार कहा गया है। अभी मुनि श्री चिंतन सागर जी महाराज ने आपको अपने चिंतन से बतलाया कि भगवान को अर्घ द्रव्य कैसे चढ़ाना चाहिए और उनका क्या आशय मतलब है ।इस बारे में आपको विस्तृत रूप से बतलाया हैं।

 

यह मंगल देशना प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर प्रवचन माला के अंतर्गत धर्म सभा में पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने प्रकट की। राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बतलाया कि आज्ञा दूर करने के लिए जिनवाणी रूपी सागर में आप सात तत्वों से द्रव्यों साथ तत्व जो पदार्थ का चिंतन कर आज्ञा दूर कर सकते हैं स्वाध्याय से ज्ञान प्राप्त होता है मंदिर सब की सुविधा के लिए बनाए जाते हैं ताकि आप दर्शन लाभ कर सके मंदिर जहां जरूरी हो वही बनना चाहिए प्राचीन मंदिरों का संरक्षण पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने मूड बद्री में जिनवाणी जो शास्त्रों के रूप में ताड़पत्रों पर अंकित ऐसे महान धवला ,महा धवला ग्रंथों को प्रेरणा देकर ताम्रपत्र पर अंकित कराया और आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव के अंतर्गत केंद्रीय समिति आचार्य श्री शांति सागर फाउंडेशन द्वारा भी अनेक प्राचीन ग्रंथो को आधुनिक वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित करने का सराहनीय कार्य किया जा रहा है। आचार्य श्री ने प्रवचन में मंदिर में प्रवेश से लेकर मंदिर में की जाने वाली सभी धार्मिक क्रियायो के बारे में सरलता से सभी को उपदेश दिया। आचार्य श्री के उपदेश के पूर्व युवा मुनि श्री चिंतन सागर जी ने अपने उपदेश में बताया कि आप देव शास्त्र गुरु के समक्ष जो द्रव्य अर्पित करते हैं उसका क्या आशय है प्रत्येक धार्मिक क्रिया शुद्धता व्याकरण आदि का ध्यान पूर्वक की जाने पर ही उसका फल प्राप्त होता है। पूजन में , स्थापना ,जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल अध्र्य किस प्रकार अर्पित करना चाहिए। समाज प्रवक्ता पवन,राजेश सराफ ,विकास अनुसार श्री आदिनाथ भगवान ,आचार्य श्री शांतिसागर जी एवं पूर्वाचार्यों के चित्रों समक्ष दीप प्रज्वलन कर आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी ब्रह्मचारी गज्जू भैया ,पारस पंचोलिया सनावद, राजेश पंचोलिया इंदौर ,निर्मल छाबड़ा रायपुर श्रद्धेय , प्रवीण बड़वाह, पवन धनोते सनावद एवं स्थानीय समिति ने भेंट कर पूजन किया। राष्ट्रीय स्तर के 3 और 4 अक्टूबर के दो दिवसीय कार्यक्रम हेतु राजस्थान के सभी नगरों में जाकर निमंत्रण दिया जा रहा हैं । राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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