मन को मोड़ने से ही जीवन परिवर्तित होता है”- मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज 

धर्म

मन को मोड़ने से ही जीवन परिवर्तित होता है”- मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज 

भोपाल (अवधपुरी)”

मनुष्य के मन में जब सही समझ विकसित हो जाती है,तो उसके चिंतन की दिशा बदल जाती है,और यह परिवर्तन ही उसकी दशा को बदल देता है” उन्होंने मन की चार स्थितियों “मन की मानना, मन को मनाना,मन को जगाना, मन को बनाना,पर अनमोल वचन प्रकट करते हुये कहा कि “जागो और निद्रा को त्यागो” अनंतकाल से यह आत्मा विषय भोग और वासना में तत्पर होकर लिप्त है,तथा कष्ट भोग रही है,उन्होंने कहा कि अच्छे कार्यों में मन को मनाना पड़ता है,जबकि बुरे कार्यों में तो मन बिना प्रेरणा के ही लगा रहता है।

 

 

 

 

उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ससंघ विद्याप्रमाण गुरुकुलम् में विराजमान है मुनि श्री ने प्रातःकालीन प्रवचन सभा में कहा”विवेक के जाग्रत होते ही मन नियंत्रित होंने लगता है”

जैसे कम्यूटर में आप जो प्रोग्राम फीड करते है,उसी अनुरूप वह कार्य करने लगता है,उसी प्रकार हमारा “मन” मस्तिष्क है,उसमें आप जैसे विचारों को फीड करेंगे तदानुरूप वह वैसा कार्य करेगा। कौनसा कार्य करनी है,तथा कौनसा कार्य 

अकरनी,यह हमारा विवेक तय करता है,जिसका विवेक जाग्रत होता है वह आत्मा के हित अहित का विचार कर करने योग्य कार्य को करता है,तथा न करने योग्य कार्य का निषेध करता है,जैसे मांस खाना, शराब पीना,आपके मन मस्तिष्क में निषेध है,और आपका त्याग है,तो आप भले ही उन लोगों के बीच में चले जाओ और कोई कितना भी आपसे जिद करे तो भी आपकी इच्छा नहीं होगी और यदि त्याग नही हुआ तो कदाचित भटक सकते है।

 

 

 

 विवेक का जाग्रत होंना आवश्यक है,ऐसे में मान लीजिये किसी ने जबरदस्ती की तो मन ग्लानि से भर उठेगा और तुरंत ही वमन हो जाएगी मुनि श्री ने कहा कि “मन का ख्याल करोगे तो मनअपनी मनमानी करेगा और थका थका के शरीर को पस्त कर देगा, उन्होंने कहा कि अब न शरीर में स्थिति बची और न मन की स्थिति बची फिर भी मन है कि उसे दौड़ा,और थका रहा है” इसलिये अपने मन को मनाइये मुनि श्री ने कहा कि”मन” को बनाने के लिये मन को मोड़ो, एक वार मन बैराग्य के रास्ते पर जाग्रत हो गया फिर मन को मनाने और बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी वह खुद ब खुद उस ओर चल पड़ेगा।

 

 

 

 उदाहरण देते हुये कहा पत्नी के मायके जाते ही दो दिन पश्चात पति ससुराल पहुंच जाता है,और पत्नी की विदा कराके जब वह लौटता है तो साथ में उसका साला भी रहता है जब वह एक स्थान से होकर निकल रहे थे तो देखते क्या है एक सिला पर दिगंबर मुनिराज ध्यान में लीन थे तप के प्रभाव से उनके चहरे से तेज स्फुटित हो रहा था पति ने मुनिराज को देखा तो वह उनसे प्रभावित हो गया जब साले की नजर अपने जीजा पर पड़ी तो उसने पूछा कि कही तुम्हारे भाव दीक्षा के तो नहीं हो रहे? तो उसने हा कहा तो साले ने कह दिया जो इंसान अपनी पत्नी को दो दिन मायके नहीं छोड़ सकता वह क्या दीक्षा लेगा? उसने सहजता से कहा कि यदि तुम दीक्षा लोगे तो में भी तुम्हारे साथ दीक्षा ले लूंगा इतनी बात सुनते ही जीजा मुनिचरणों में पहुंच दीक्षा का निवेदन कर दिया और जीजा को दीक्षा लेते देख साले ने तथा उसकी पत्नी ने भी दीक्षा ले ली।

        संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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