सबके अपने कर्म होते हैं जो अपना फल देते हैं आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज 

धर्म

सबके अपने कर्म होते हैं जो अपना फल देते हैं आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज 

रामगंजमंडी

 परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में हो रहे सिद्धचक्र महामंडल विधान के द्वितीय दिवस सिद्धों की आराधना करते हुए मंडल पर अरघ समर्पित किए गए। भक्ति में झूमते गाते भक्तों ने यह महामंडल विधान किया। यह महामंडल आचार्य श्री संघस्थ ब्रह्मचारी भैयाजन द्वारा हो रहा जिसका निर्देशन भारत गौरव प्रतिष्ठाचार्य ब्रह्मचारी डॉक्टर शोभित भैया मंडावरा, बाल ब्रह्मचारी स्वतंत्र भैया टीकमगढ़, पंडित जयकुमार जैन बड़ागांव, पंडित श्री सुलभ शास्त्री कुटोरा कर रहे। और विधि विधान से महामंडल विधान को संपन्न कर रहे हैं यह महामंडल विधान संस्कृत में हो रहा है जो रामगंज मंडी में प्रथम बार हो रहा है। 

 

विधान के क्रम में प्रवचन सभा का शुभारंभ मंगलाचरण से हुआ मंगलाचरण ब्रह्मचारी प्रीती दीदी द्वारा किया गया। इसके बाद नगर के प्रबुद्ध जनों ने आचार्य श्री 108 विराग सागर महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन किया। आचार्य श्री ने मंगल प्रवचन में कर्म के विषय में बताया उन्होंने उदाहरण के माध्यम से बताया कि कोई व्यक्ति आम का पौधा लगाता है, इसलिए लगाता है कि इसमें फल मिलेगे इस संसार में कोई भी व्यक्ति कोई कार्य करता है वह सोचता है इसका फल मुझे मिलेगा। हम विधान कर रहे है थे यह अपेक्षा है मोक्ष मिले और मोक्ष न मिले तो पुण्य मिले। यह लक्ष्य रहता है लक्ष्य मिल जाए न मिले तो लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले कदम मिल जाए।

आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज की आहारचर्या करवाते हुए शाहजी परिवार के सदस्य
गंधकुटी में विराजित भगवान
आचार्य श्री 108 विराग सागर महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन करते समाज बंधु

 

  इस संसार में बहुत से लोग दुखी और सुखी हैं कोई भीख मांग रहा है कोई मजदूरी कर रहा हे कोई नौकरी कर रहा है,कोई बहुत अच्छा व्यापार कर रहा है और कोई व्यक्ति उससे भी अच्छा व्यापार कर रहा है। देखे तो यह पता लगता है तो यह पता चलता है कोई व्यक्ति अर्थ के अभाव में जी रहा है और कोई व्यक्ति अर्थ के सद्भाव में जी रहा है।

 

 

   कर्म सबको अपने कर्मों के अनुसार फल देते हैं। 

   आचार्य श्री ने कर्मफल के विषय में बताया कि कर्म व्यक्ति को अपना अपना फल देते हैं जिस व्यक्ति का जैसा कर्म है उसे वैसा फल मिलने वाला है।

 

      भगवान कुछ नहीं करता 

आचार्य श्री ने कहा कि लोग कहते हैं कि जो कुछ करता है भगवान करता है लेकिन भगवान कुछ नहीं करता है लेकिन अगर भगवान इस दुनिया को बनाता तो वह ऐसी बनाता बहुत सुंदर बनाता। कचरा नाम की चीज ही नहीं होती इस दुनिया में और गंदगी की नाम की भी कोई चीज नहीं होती। और बुराई नाम की भी कोई चीज नहीं होती इसअगर भगवान इस दुनिया को बनाएगा तो बहुत अच्छे से बनाएगा। इस दुनिया को भगवान ने नहीं बनाया यह दुनिया लोगों के कर्म से चलती है। कर्म के उदय और कर्म के फल से चलती है दुनिया। कर्म का फल प्रत्येक जीव को मिलता है। कर्म का फल व्यक्ति को भोगना ही पड़ता है। 

 

 

 

 

 

आत्मा से बंधे हुए कर्म है जो जीव को परतंत्र करता है 

    आचार्य श्री ने कर्म के विषय में कहा कि आत्मा से बंधे हुए कर्म होते हैं जो जीव को परतंत्र करता है, कर्मों की परतंत्रता का कारण ही संसार है और हम परतंत्रता के कारण ही संसार में है। हमारा संसार में रहने का स्वभाव ही नहीं है। यह कर्मों के कारण है हमें संसार में रहना पड़ रहा है संसार के जन्म मरण को सहना पड़ रहा है। क्योंकि कर्म आत्मा से बंधे हुए हैं क्योंकि कर्म हमने बांधे हैं। यह महामंडल विधान द्रव्य चढ़ाने के लिए नहीं है यह सिर्फ कर्म सिद्धांत को समझने के लिए है। अगर श्रीपाल ने मुनिराज को देखकर अशुभ भाव नही किया होता तो उसे कोढ नही होता

 

  

 

  अपने आपको देखोगे तो मार्ग मिलता है 

    आचार्य श्री ने कहा कि हमें किसी को देखने की जरूरत नहीं है अपने आप को देखें अपने आप को अगर हम देखेंगे और और चिंतन करेंगे चिंतन होता है तो मार्ग मिलता है। अपने आपको देखने में ही फायदा होता है। जैन दर्शन कहता है किसी को देखो ही मत अपने आप को देखो इतना देखो की चिंतन समीचीन हो जाए और मार्ग सच्चा हो जाए। 

 

 

उन्होंने कहा लोग दूसरे को देखते हैं और दूसरों को देखने की आदत सी पड़ गई है। अशुभ कर्म बांधने की और आदत पड़ गई अशुभ भाव बनाने की। यदि इसी प्रकार की आदत बनी रही तो ऐसा ही चलता रहेगा जैसा चिंतन जैसा सोच जैसा विचार हमारा होगा सब कुछ वैसा ही होगा। 

 

    विशुद्धि बढ़ाने की जरूरत है

  उन्होंने कहा कि हमें भी श्रीपाल मेना सुंदरी के जैसे भावों को जगाने की जरूरत है जब वह भी कर्म भोग सकता है तो हमारी स्थिति क्या हो सकती है कर्म और कर्म फल हमारा निरंतर पीछा करते हैं हम कहीं भी चले जाएं। यदि हम भी मेना सुंदरी श्रीपाल राजा जैसी विशुद्धि को बढ़ाएंगे तो पुण्य में वृद्धि होगी इसीलिए विशुद्धि को बढ़ाओ यह जाप विधान के द्वारा बढ़ेगी जैसे-जैसे विशुद्धि बढ़ेगी संसार भी कम होगा। मन में शुभ विचार करने पर शुभ होगा। व्यक्ति जैसा सोचता है वैसा होने लगता है और वैसा ही भाव बनता है l आचार्य श्री की आहारचर्या एवं चरण वंदना का लाभ महावीर कुमार दीपक कुमार शाहजी परिवार रामगंज मंडी को प्राप्त हुआ

     अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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