8 जनवरी गुरुवार को स्टेशन जैन मंदिर के सामने विशेष पांडाल में नर्सरी से लेकर पांचवीं तक के बच्चों को “स्वर्णप्राशन” दवा निःशुल्क पिलाई जायेगी
विदिशा
संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागरजी महामुनिराज के द्वितीय समाधि दिवस के पूर्व बेला में स्वर्णप्राशन का कार्यक्रम जो कि 8 जनवरी गुरुवार को विदिशा नगर में 140प्राथमिक/ माध्यमिक शालाओं तथा 139 आंगनबाड़ीयो के माध्यम से होंने जा रहा है, शीतलहर की स्थिति को देखते हुये जिला प्रशासन ने 7-8 जनवरी को सभी स्कूलों में कक्षा पांच तक अवकाश घोषित किया गया है उपरोक्त गाईडलाईन का ध्यान रखते हुये सकल दि. जैन समाज द्वारा कार्यक्रम में परिवर्तन किया गया है।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया उन सभी बच्चों को जो नर्सरी से लेकर कक्षा पांच तक एवं वह सभी बच्चे जो किन्हीं कारणों से स्कूल नहीं जा पाते है उनको स्वर्ण प्राशन दवा निःशुल्क पिलाई जाएगी।
सभी बच्चों के अभिभावकों से निवेदन है कि आप अपने बच्चों को स्वर्णप्राशन पिलाने हेतु माधवगंज स्थित श्री शांतिनाथ दि. जैन मंदिर के सामने कांच मंदिर के बगल में विशेष बड़ा पांडाल लगाया जा रहा है उसमें लेकर आयें कार्यकर्ताओं की टीम वहा उपस्थित रहेगी एवं सभी बच्चों को स्वर्ण प्राशन की दो बूंद गुरुवार को ही गुरुदेव के आशीर्वाद से पिलाई जायेगी।
यह कार्यक्रम प्रातः8:30 बजे से प्रारंभ होगा तथा सांयकाल पांच बजे तक निरंतर जारी रहेगा तथा कक्षा छै से दसवीं तक के बच्चों को स्वर्ण प्राशन पिलाने के लिये श्री सकल दि. जैन समाज की टीम उनके स्कूल में ही पहुंचेगी।


प्रातःप्रवचन सभा में मुनि श्री ने कहा कि जहा पर गुरुदेव का आशीर्वाद होता है,वहा पर चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है उन्होंने भगवान महावीर के कैवल्य ज्ञान की चर्चा करते हुये कहा कि राजगृही में विपुलाचल पर्वत पर भगवान महावीर का समवसरण लगा हुआ था पूरी 12 सभाऐं ठसाठस भरी हुई थी चार कोठा देवताओं के थे तो चार सभाओ में सभी देवीयाँ विराजमान थी,एक कोठे में सभी गणधर परमेष्टी एवं मुनिराज विराजमान थे एक कक्ष में सामान्य पुरुष एवं दूसरे कक्ष में महिलाऐं विराजमान थी वहीं एक कक्ष में जन्मजात बैरभाव को भुलाकर एक साथ असंख्यात त्रियंच पशु बैठे हुये है जैसे सर्प और नेवला,शेर गाय बिल्ली और कुत्ता आदि सभी प्राणी भगवान की वाणी का अमृतपान करने के लिये बैठे हुये है सभी 12 सभाऐं ठसाठस भरी हुई है लेकिन भगवान की वाणी नहीं खिर रही थी, 65 दिन हो गये लेकिन भगवान की वाणी नहीं खिरी तो सौधर्म इंद्र को चिंता हुई और उन्होंने गणधर की खोज प्रारंभ की और वह बटुक रुप में इंद्रभूति गौतम जो अपने पांच सौ शिष्यों को अध्ययन करा रहे थे उनके पास पहुंचे और अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी कि पंचास्तिकाय, छै दृव्य, पांच महावृत आदि यह क्या होते है?इसके स्वरुप को हम जानना चाहते है तब इंद्र भूती ने कहा कि चलो हम भगवान महावीर के समवसरण में ही चलते है और उनसे ही पूछते है और आगे आगे इंद्रभूति और पीछे पीछे सौधर्म इंद्र भगवान महावीर के समवसरण की ओर आगे बढ़ते है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312



