नियत और सोच अच्छी होनी चाहिए प्रसन्न सागर महाराज
दिल्ली
अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज ससंघ तरुणसागरम तीर्थ पर वर्षायोग हेतु विराजमान हैं उनके सानिध्य में वहां विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम संपन्न हो रहें हैं उसी श्रुंखला में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा किनियत और सोच अच्छी होनी चाहिए..
बातें तो कोई भी अच्छी अच्छी कर लेता है..!जीवन में सुख और दुःख दोनों ही हमारी यात्रा के महत्वपूर्ण अंग है। कोई भी ऐसा इंसान नहीं है जिसने केवल सुख देखा हो या केवल दुःख झेला हो। यह दोनों ही अनुभव, जीवन को संतुलित करते हैं और हमें जीवन के गहरे अर्थ को समझने का अवसर देते हैं। दुःख जीवन का वही हिस्सा है जो हमें मजबूत बनाता है। असफलता संघर्ष और कठिनाइयां हमें यह समझाती है कि हमारी क्षमताएं कितनी बड़ी है। दुःख हमारे भीतर की इच्छा शक्ति को जागृत करता है और हमें आत्मनिर्भर बनाता है। हर सुख के दरवाजे से दुःख झांक रहा होता है।
एक प्रसंग मुझे याद आता है – कृष्ण ने पांडवों की माता कुंती से कहा – युद्ध हो गया, युद्ध जीत गए, आज तक आपने मुझसे कुछ नहीं मांगा, आज कुछ तो मांग लो। माता कुंती ने बड़े संकोच से कहा – प्रभु देना ही है तो मुझे विपत्ति दो, कष्ट दो। कृष्ण ने कहा – यह सब तो तुम्हें तकलीफ देंगे, यह क्यों मांग रही हो-? कुंती माता ने कहा – दुःख और कष्टों में आपका स्मरण होता है। दुःख में आपकी याद आती है, इस याद के लिए मुझे दुःख चाहिए।



वह दुःख नहीं सुख है, दुःख को दूर करने के लिए सबसे अच्छी दवा यही है कि उसका चिंतन छोड़ दिया जाए, क्योंकि चिंतन से वह सामने आता है और अधिकाधिक बढ़ता रहता है। दुःख हमारे जीवन में बिना किसी वजह के नहीं आता। जीवन में सुख और दुःख दोनों ही अनिवार्य रूप से साथ-साथ चलते हैं।
घोर अंधकार में जिस प्रकार दीपक का प्रकाश सुशोभित होता है, उसी प्रकार दुःख का अनुभव कर लेने पर सुख का आगमन आनंदप्रद होता है…!!!
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

