भगवान तुल्य माता और पिता का अनादर करने से बड़ा कोई पाप नहीं हो सकता: आर्यिका विज्ञानमति
खुरई
प्राचीन जैन मंदिर में आर्यिकारत्न विज्ञानमति माताजी ने कहा कि जिनके पांच-पांच पुत्र भी होते हैं वह भी वृद्ध माता-पिता की सेवा करने से बचने का प्रयास करते हैं। यह धारणा ठीक नहीं।
माताजी ने कहा की मातापिता ने तुम्हारा पालन -पोषण कर इतना बढ़ा किया, इतना योग्य बनाया, नौ माह अपने गर्भ में रखा आपकी हर खुशी के लिए प्राण तक बलिदान करने को तैयार रहे, ऐसे भगवान तुल्य माता-पिता का अनादर करने से बड़ा कोई पाप हो नहीं सकता।

वर्तमान समय में अधिकतर यह देखने मिलता है कि धनी से धनी व्यक्ति भी अपने बूढ़े माता-पिता को या तो वृद्धाआश्रम में किसी अन्य धार्मिक संस्थान में भेजने के लिए आतुर प्रतीत होता है या माता-पिता की सेवा के लिए कर्मचारी लगा देता है। परंतु इन सबसे क्या बूढ़े माता-पिता के दिल में खुशी मिलती है, यह तो उन बूढ़े माता पिता से ही पूंछो । वृद्ध व्यक्ति कुछ नहीं चाहता वह तो मात्र यह चाहता है कि मेरे बेटा, बहू, नाती, पोता हमारे पास दो मिनिट के लिए जरूर बैठें। परन्तु यह देखने में आता है कि ऐसा संभव नहीं हो पाता जो सर्वथा अनुचित है।
उन्होंने मंदिर में दर्शन करने की विधि को स्पष्ट करते हुए प्रवचन देते हुए कहा कि हम जब भी त्रिलोकीनाथ भगवान के दर्शन वंदन करने अपने घर से निकलें तब आपका हृदय भगवान के दर्शन के ही लिए समर्पित हो।हाथ में पुंज लेकर ही दर्शन वंदन करने जाएं। जहां तक बन सके मौन रहकर ही मंदिर को प्रस्थान करें,रास्ते में आते-जाते समय कोई भी घर गृहस्थी के कामों को न करें। उन्होंने कहा कि पूजन, जाप करते समय हमें घरगृहस्थी के बारे में या अन्य कोई समस्या आदि, सुख-दुःख, यहां-वहां की बातो का स्मरण नहीं करना चाहिए। तभी आपकी पूजा-अर्चना सार्थक होगी। उन्होंने कहा कि मंदिर में ही व्यक्ति
जाने-अंजाने में बहुत सीगलतियां कर ही देता है, इससे बचें। परनिंदा तो कभी न करें।उन्होंने कहा जैन धर्म पूर्णरूपेण भावनाओं पर आधारित ही धर्म है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
