पूज्य मुनि पुंगव श्री सुधा सागर महाराज को दीक्षा लिए हुए 43 वर्ष पूर्ण हुए आज तिथि नहीं बल्कि तप संयम साधना की प्रेरणादायी गाथा का उत्सव है 

धर्म

पूज्य मुनि पुंगव श्री सुधा सागर महाराज को दीक्षा लिए हुए 43 वर्ष पूर्ण हुए आज तिथि नहीं बल्कि तप संयम साधना की प्रेरणादायी गाथा का उत्सव है 

 अशोकनगर 

25 सितंबर 1983 को सम्मेद शिखरजी की तलहटी में बसे ईसरी बाजार झारखंड की पावन धरती पर हिंदी महीने के हिसाब से आज ही की तिथि पर आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज ने दिगंबर परम्परा को एक अमूल्य रत्न निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 सुधा सागर महाराज के रूप में दिया। आज इन अविस्मरणीय क्षणों को 43 वर्ष पूर्ण हो गए हैं। 

 

 

   जयकुमार से बने सुधा सागर महाराज का दीक्षा का क्रम 9 था जो की शुभ माना जाता है। 

   आचार्य श्री ने जय कुमार को दीक्षा व्रत देते वक्त उनका क्रम 9 वे नंबर पर रखा जोकि शुभ और शाश्वत माना जाता है। इसके पीछे का आशय यह होता है कि यह अंक किसी भी परिस्थिति में अंत को प्राप्त नहीं होता है। यह अंक पूर्णता अनंतता का प्रतीक होता है। क्योंकि 9 को किसी भी अंक से गुणा किया जाए , तो अंत में 9 ही शेष रहता है। मुनि श्री का जीवन भी संयम और साधना के मूल स्वरूप में हमेशा अडिग रहेगा। यह क्रमांक अपने आप में उनके तपस्वी जीवन का द्योतक है। 

 

 

   मुनि श्री की प्रेरणा से अनगिनत धर्म प्रभावना एवं जन कल्याण के लिए कार्य हुए हैं।

    मुनि श्री ने अब तक अनगिनत पंचकल्याणक प्रतिष्ठायें, जीर्णशीर्ण हो चुके तीर्थ क्षेत्रों का जीर्णोद्धार सैकड़ो गौशालाएं पक्षी शालाएं , स्कूल छात्रावास अस्पताल आदि सामाजिक कार्यों के लिए प्रेरित किया और उनकी स्थापना करवाई।

 

 प्रवचन शैली अद्भुत 

 महाराज श्री के प्रवचन की शैली बहुत ही अद्भुत है उनके प्रवचनों में बहुत गहराई है उनके प्रवचन शैली विद्वत जनों के साथ-साथ सभी को अपनी ओर आकर्षित करती है। 

 

      अनेक धार्मिक ग्रंथो का हुआ प्रकाशन 

     महाराज श्री के मार्गदर्शन से दर्जनो धार्मिक ग्रंथो का प्रकाशन हुआ है और अनगिनत आत्माएं संयम और सदाचार की ओर प्रेरित हुई है। 43 वर्षों की अखंड साधना हम लोगों को यही चीज सिखाती है कि यदि संकल्प दृढ़ हो तो जीवन तप और संयम की एक सजीव मूर्ति बन सकता है। महाराज श्री का जीवन भी इसी सत्य का प्रमाण है कि आत्म बल से बढ़कर कोई शक्ति नहीं।

 

   महाराज श्री ने अपनी साधना से असंभव लगने वाले कार्य संभव कर दिखाएं 

  महाराज श्री की साधना पर यदि नजर डाली जाए तो उन्होंने ऐसी साधना की है जो असंभव होती है उन्होंने उसे संभव कर दिखाया जिसमें उन्होंने 36 घंटे तक एक ही आसान पर खड़े रहकर तपस्या की है यही तपस्या उनके धैर्य और संकल्प का जीवन उदाहरण है।

  

24 घंटे तक अखंड साधना जब आत्मा तप में तल्लीन हो तो संयम का बोध मिट जाता है। 

 

  12 घंटे एकआसन तप मानव शरीर मूर्ति हो और आत्मा साधना में लीन 

     10 लक्षण पर्व के मौके पर 10 दिन तक बिना निद्रा लिए हुए ध्यान में लीन रहना और फिर भी चेहरे पर शिकन नहीं आना यह किसी चमत्कार से कम नहीं। 

9 महीने का अखंड मोन तप 

  यह मोहन केवल शब्दों का त्याग नहीं था बल्कि आत्म चिंतन और आत्म अनुशासन का महाकाव्य था इस मोन साधना में उन्होंने आत्मा की गहराइयों को छूकर साधकों को दिखा दिया कि मोन वाणी से कई अधिक शक्तिशाली है। 

 

  महाराज श्री अपने भक्तों से कहते हैं कि साधना वही है जिसमें शरीर की सीमाएं टूट जाएं और आत्मा का सामर्थ्य प्रकट हो। 

        संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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