संजय बड़जात्या की कलम से

धर्म

कितना कोतुहल, कितनी आकांक्षाएं, कितनी मन में भावनाए की गुरुवर का एक बार दर्शन हो जाए। दर्शन करने के बाद मन नहीं भरता है और बार-बार यही गुहार लगाता है कि जितनी बार दर्शन हो एव जितना अधिक समय गुरुवर का सामीप्य पा सके उतना ही कम है ।
संपूर्ण भारतवर्ष की जैन समाज में जिन्हें छोटे बाबा या आचार्य श्री के नाम से जाना जाता है ऐसे हमारे परम शिरोमणि संत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज जिन्हें वर्तमान का *जीवंत बड़े बाबा* कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वर्तमान में स्वास्थ्य की अनुकूलता नहीं है किंतु विहार अनवरत रूप से जारी है ।उनके समीप जितना अधिक ध्वनि (शोर) होता है उतना ही उनको कष्ट पहुंचता है। किंतु श्रावक भी क्या करें वह भी मजबूर है अपने आराध्य के प्रति वात्सल्य भाव ही इतना अधिक है। हम सब श्रावकों की यही भावना है कि गुरुवर स्वस्थ रहते हुए दीर्घायु हों, शतायु हो।
संजय जैन बड़जात्या कामां

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