लघु सिद्ध चक्र महामंडल विधान के साथ एवं भव्य शोभायात्रा के साथ दसलक्षण पर्व का हुआ समापन आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में हुईं महती तप आराधना
रामगंजमंडी परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में 10 लक्षण पर्व भक्ति भाव से संपन्न हुए शनिवार की बेला में 10 लक्षण पर्व का अंतिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य के रूप में मनाया गया एवं सर्वप्रथम आचार्य श्री के सानिध्य में श्रीजी का अभिषेक शांति धारा की गई इसके उपरांत तत्वार्थ सूत्र के तीन मुख्य मंडलों पर अर्ध समर्पित किए गए। 10 लक्षण पर्व के अंतिम दिन गुरुदेव ने उत्तम ब्रह्मचर्य पर अपना मंगल उद्बोधन दिया
आचार्य श्री के सानिध्य में हुई महती तप आराधना
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज की त्याग तपस्या एवं प्रेरणा का प्रभाव यह रहा की अनेक लोगों ने तप आराधना की संयुक्त रूप से जानकारी देते हुए संरक्षक अजीत सेठी, अध्यक्ष दिलीप विनायका उपाध्यक्ष चेतन बागड़िया उपाध्यक्ष कमल लुहाड़िया महामंत्री राजकुमार गंगवाल मंत्री राजीव बाकलीवाल ने बताया कि गुरुदेव की प्रेरणा एवं उनकी तपस्या का प्रभाव यह रहा की अनेक लोगों ने तप आराधना की जिसमें 16 उपवास दो तपस्वियों ,10 उपवास दस तपस्वियों ,पांच उपवास 11 तपस्वियों, तीन उपवास 25 तपस्वियों ने किए
रामगंजमंडी के इतिहास में प्रथम बार हुआ लघु सिद्ध चक्र महामंडल विधान
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज संघ के सानिध्य में 10 लक्षण पर्व के अंतिम दिन लघु सिद्ध चक्र महामंडल विधान हुआ । जिसमें सभी समाज जन ने भक्ति भाव के साथ किया गया महामंडल विधान में संपूर्ण उत्साह से भरपूर रहा दोपहर की बेला में नगर के प्रमुख मार्गो से होते हुए शोभायात्रा निकाली गई शोभायात्रा में तपस्वी भी शामिल रहे एवं सभी समाज बंधुओ ने उनके तप की अनुमोदना की उसके उपरांत श्री जी का अभिषेक एवं शांति धारा की गई। इसी क्रम भगवान वासुपूज्य का मोक्ष कल्याणक महोत्सव मनाया एवं निर्वाण लाडू समर्पित किया गया। आचार्य श्री ने उत्तम ब्रह्मचर्य पर प्रवचन देते हुए कहा कि ब्रह्मचर्य का महत्व बताते हुए कहा कि बृह यानी आत्मा चर्या यानी रमण करनाइसका अर्थ है आत्मा में रमण करना ब्रह्मचर्य है। सारे के सारे दस धर्म आपको उंगली पड़कर यहां तक लाए आज हम यहां तक पहुंच गए अब हमें कुछ छोड़ने की जरूरत नहीं है अब आनंद उठाने की जरूरत है। हमें आत्मीय आनंद उठाने की जरूरत है। जितना भी ध्यान धर्म ध्यान हम करते हैं कि हम यही कल्पना करते हैं और यही भावना करते हैं कि हमें मुक्तिवधु मिल जाए उन्होंने कहा आचार्यों ने मोक्ष की कल्पना मुक्तिवधु के रूप में की है। उन्होंने कहा 10 दिन में जो आपको मिला है वह आपकी आत्मा के लिए अपूर्व है आत्मा हर पर्यूषण में कुछ नया ग्रहण करती है।
उन्होंने कहा रावण ने जो भूल की दुर्योधन ने जो भूल की आप यह भूल मत करना न मन से, न वचन से, न काय से रावण की भूल और दुर्योधन की भूल आप सभी को पता है हमने यह ठान लिया यह नहीं करना तो उत्तम ब्रह्मचर्य आएगा उन्होंने कहा सबसे ज्यादा कष्ट सबसे ज्यादा पीड़ा देने वाला मोबाइल है इस विषय पर बहुत सोचने की जरूरत है नहीं सोचोगे तो सारे किए पर पानी फिर जाएगा करते करते-करते गाड़ी धर्म के विरोध में आकर टिक जाती है।
सबको पता है कौन सी चीज गलत है और कौन सी चीज सही है और कौन सी चीज गलत है। साधन सुविधाओं के कारण विकृति बढ़ती जा रही है और बढ़ती चली जा रही है।
हमारी वर्गणाए प्रकृति को प्रभावित करती हैआचार्य श्री ने कहा कि हमारी अच्छी और बुरी वर्गणाए प्रकृति को प्रभावित करती हैं।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312













