स्वयं में रमना स्वयं में उतरना स्वयं में खो जाना उत्तम ब्रह्मचर्य है प्रसन्न सागर महाराज
दिल्ली
अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज ससंघ तरुणसागरम तीर्थ पर वर्षायोग हेतु विराजमान हैं उनके सानिध्य में वहां विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम संपन्न हो रहें हैं उसी श्रुंखला में पर्यूषण महापर्व के उत्तम ब्रम्हचर्य धर्म पर उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि पर्वो के पर्वराज का दस वां चरण – उत्तम ब्रह्मचर्य स्वयं में रमना – स्वयं में उतरना – स्वयं में खो जाना ही उत्तम ब्रह्मचर्य है..!
ब्रह्मचर्य यानि – लक्ष्मण रेखा को खींचना। ब्रह्म जैसी चर्या ही उत्तम ब्रह्मचर्य है । ब्रह्मचर्य जैसी कठिन साधना सिर्फ और सिर्फ एक मन को साधने से ही सम्भव है। चेतना की भूख – परमात्मा से मिलाती है। मन और शरीर की भूख 96 हजार रानियाँ मिलने से भी तृप्ति नहीं मिल पाती।
जीवन की ऊर्जा को- काम में नहीं – राम में लगायें।
भोग में नहीं – योग में लगायें। संसार में नहीं – साधना में लगायें। वासना में नहीं – प्रार्थना में लगायें।
सरकार परिवार नियोजन की चिन्ता करती है और धर्म – पाप नियोजन की चिन्ता करता है। हमने देखा है कि नजर का चश्मा लग जाने के बाद, चीजें काफी साफ नजर आती है। अखबार में छपी हुई खबरें, कागज पर लिखे हुए शब्द, बाजारों में दूर-दूर की दुकानें, लोगों के रंग बिरंगे कपड़े, और भी बहुत कुछ, साफ-साफ नजर आता है, मगर हमारी नियत और नजर साफ नहीं हो पाती है।
नजर और नियत को संभालना ही उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म है…!!! नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
