जो तप-त्याग की भट्टी में तपते हैं, दुनिया के बाजार में वही सिक्के चलते हैं…!!! प्रसन्न सागर महाराज
दिल्ली आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कि जिन्दगी में कुछ करने का, हौसला बुलन्द होना चाहिए..फिर आप ज़िन्दगी का जीना, कहीं से भी शुरू कर सकते हैं..!
महाराज श्री ने कहा हमने अभी चलना शुरू किया है, उड़ना अभी बाकी है..अभी नापी है मुट्ठी भर जमीन हमने, आसमान नापना बाकी है..!


उत्तम तप का अर्थ है – मन की उछल कूद को रोकना। इच्छाओं को रोकना ही उत्तम तप है। जो दिख रहा है वो संसार बहुत छोटा है, लेकिन जो मन में बसा है वो संसार अनन्त है।
आज का आदमी अपने बच्चों को कम, इच्छाओं को ज्यादा पाल रहा है,, इसलिए दिन भर दुखी परेशान होकर दिन गुजारता है। जन्म एक बच्चे का होता है लेकिन उसके साथ हमारी अनेकानेक इच्छायें जन्म ले लेती है। इसलिए अपनी औक़ात से ज्यादा इच्छा मत करना, क्योंकि इच्छा ही दुखदायी है। आशा भटकाती है, आशा दौड़ाती है। यह संसारी प्राणी एक आशा पुरी करने के लिये भागम-भाग कर रहा है। यदि मनुष्य दो पर कन्ट्रोल कर ले तो 90% दुःख, परेशानी, बीमारियों से आज अभी बच सकता है —
एक चक्षु इन्द्रिय,
दूसरी रसना इन्द्रिय।चक्षु इन्द्रिय सभी पापों की जड़ है, तो दूसरी इन्द्रिय समस्त बीमारियों की जड़। भूख से कम भोजन करना भी तप है। इसलिए भूख से कम खाना चाहिए। बहुत भोजन करने वाले लोग प्रखर बुद्धि के नहीं होते, ऐसे लोग जड़ बुद्धि और अल्प आयु वाले होते हैं। 
साधु-सन्यासियों और ज्ञानी जीवों को देखो – कम से कम भोजन करते हैं और लम्बे समय तक जीते हैं, वो भी बिना बीमारियों के। इसलिए जो लोग भोजन को दवा समझ कर खाते हैं, वो दवाखाने जाने से बच जाते हैं, और जो भोजन को दबा-दबा के खाते हैं, वो दवाखाने जाते हैं।

जो तप-त्याग की भट्टी में तपते हैं, दुनिया के बाजार में वही सिक्के चलते हैं…!!! नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

