जितना कष्ट सहोगे उतने समर्थ बनोगे,कठिन समय मजबूत इंसान को जन्म देता है”- मुनि श्री प्रमाणसागर

धर्म

“जितना कष्ट सहोगे उतने समर्थ बनोगे,कठिन समय मजबूत इंसान को जन्म देता है”- मुनि श्री प्रमाणसागर

भोपाल(अवधपुरी)

दशलक्षण पर्व के अंतर्गत चल रहे संस्कार शिविर में जिसमें संपूर्ण भारत से शिवारार्थी आए हुये है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया सभी शिवारार्थितो ने प्रातः5:30 बजे मुनि श्री के मुखारविंद से लगभग 30 मिनट का भावनायोग किया तत्पश्चात भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न हुई एवं नित्यनियम पूजन के साथ पर्व पूजन एवं दशलक्षण विधान संपन्न हुआ।

 

 

 इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुये “तपस्या” के महत्व को बताते हुये कहा कि “भोग विलास और मौज मस्ती सभी को अच्छी लगती है,और त्याग तपस्या तथा संयम साधना से दूर भागते है,जबकि त्याग तपस्या और संयम साधना में ही जीवन की वास्तविकता है, मुनि श्री ने “उत्तमतप” धर्म पर चार शब्द प्रेय,श्रैय,हेय,ध्येय, की व्याख्या करते हुये कहा कि “जोअच्छा लगे वह प्रेय है और जो अच्छा बनाये वह श्रैय है” दुनिया प्रेय के पीछे पागल है,उसके पीछे भाग रहे है वह सभी भोगी है,जो श्रैय के पीछे लग जाये वह योगी है, मुनि श्री ने कहा कि “प्रेय” की यात्रा रेत के टीले पर चढ़ने के समान है, जिसमें मखमली अहसास होता है,यह अल्पकालिक ऊंचाई देता है लेकिन उस पर टिक नहीं पाता रेत खिसकती है और वह धड़ाम से नीचे आ जाता है, “प्रेय” क्षणभंगुर,विनाशक तथा मिट जाने वाला है,उन्होंने कहा कि यह सत्य है कि किसी ऊंची पहाड़ी पर चढ़ना,बड़ा कठिन होता है,एक एक कदम संभल संभल कर चलना पड़ता है, एक कदम भी डगमगाये कि सीधे नीचे, उन्होंने कहा कि चढ़ना भले ही कष्टकारी हो लेकिन एक बार व्यक्ती पहाड़ के शिखर पर पहुंच जाए तो उसे प्रकृति के रम्यरुप का जो दर्शन होता है वह अदभुत होता है,तथा वह आनंद से भर देता है यह “श्रैय” है,

 

मुनि श्री ने पूछा “जिसमें कठिनाई है लेकिन अंत अच्छा है,तथा जिसमें आराम है,अंत बुरा बताइये आप किसे पसंद करेंगे? मुनि श्री ने कहा कि “जीवन मेंं जितना आराम पसंद करोगे,उतने कमजोर बनोगे,और जितना कष्ट सहोगे उतने समर्थ बनोगे” एक विचारक ने लिखा कि कठिन समय मजबूत इंसान को जन्म देता है,और सरल समय इंसान को कमजोर बनाता है, जितने आराम तलब जीवन को जिओगे उतने कमजोर बनोगे उत्तमतप” धर्म का यही संदेश है।

 

 

 

 

भोग की इस अंधी दौड़ में आत्मा का सौन्दर्य धुंधला पड़ता जा रहा है,तप का अर्थ केवल उपवास, मौन या शरीर को कष्ट देना नहीं बल्कि वासनाओं की लपटों से अपने आपको बचाये रखना तथा अपनी आत्मा में रमे रहना ही उत्तम तप है।

 

 

 

मुनि श्री ने कहा कि सोशल मीडिया से कुछ क्षण का मनोरंजन तो हो सकता है,लेकिन इससे आत्मा की भूख नहीं मिटती आत्मा के स्थाई आनंद के लिये विलंबित सुख, प्रलोभनों में स्थिर, क्रोध, मोह,राग, द्वेष की स्थिति उत्पन्न होंने पर अपने आपको शांत रखना तप है तथा यह मानसिक अनुशासन को सिखाता है।जैसे अग्नि में सोना तप कर कुंदन बनता है वैसे ही संकटों की आंच से आत्मा निखरती है। 

      संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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